Thursday, September 1, 2011

तपस्विनी: एक परिचय (Tapasvini: Ek Parichaya) Dr.Harekrishna Meher




















Original Oriya Mahakavya ‘TAPASVINI’  
of Poet Gangadhara Meher (1862-1924). 
*
Complete Translation into Hindi, English and Sanskrit languages
By : Dr. Harekrishna Meher.

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Tapasvini : Ek Parichaya / Dr.Harekrishna Meher 
[ Taken from My Hindi ‘Tapasvini’ Book ]
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This Article is an Introduction to My Hindi Translation 
of ‘Tapasvini’ Kavya
Published by Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, 

Orissa, in the year 2000.
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* तपस्विनी : एक परिचय * 
लेख : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
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 ॥ १ ॥ 
भारतीय साहित्य के महान् प्रतिभाशाली निर्माताओंमें से अन्यतम विशिष्ट शिल्पी हैं ओड़िशा के स्वभावकवि गंगाधर मेहेर । ओड़िआ वाङ्मय के इन मूर्धन्य काव्यकार का जन्म हुआ था ९ अगस्त १८६२ ख्रीष्टाब्द पवित्र श्रावणी पूर्णिमा रक्षाबन्धन के दिन तत्कालीन सम्बलपुर जिल्लान्तर्गत बरपाली गाँव में और तिरोधान ४ अप्रैल १९२४ चैत्र अमावस्या में । उनकी कृतियों का संकलन ‘गंगाधर ग्रन्थावली’ ओड़िशा में सुप्रसिद्ध है । उनके प्रमुख काव्य हैं : ‘तपस्विनी’, ‘प्रणयवल्लरी’, ‘इन्दुमती’, ‘कीचकवध’, ‘उत्कललक्ष्मी’, ‘अयोध्या-दृश्य’, ‘पद्मिनी’ आदि । ग्रन्थावली कई बार प्रकाशित होकर बहुत लोकप्रिय बन चुकी है । उनकी कृतियों तथा जीवन की विभिन्न दिशाओं पर कई शोध ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं । विद्यालय पाठ्य की दृष्टि से अल्पशिक्षित होने पर भी कवि ने अपने संघर्षमय जीवन में मौलिक प्रतिभा का उत्कृष्ट परिचय प्रदान किया है ।

उनकी रचनाओं में मुख्य रूप से भारतीय संस्कृति के आदर्श और उत्कर्ष प्रतिपादित किये गये हैं । रामायणीय तथा महाभारतीय भावों से कवि की अमर कृतियाँ कुछ प्रभावित हैं । उनकी मौलिकता अनन्य रूप से सहृदय जनों का अन्तःकरण हर लेती है । काव्यों के अतिरिक्त कवि ने लिखे व्यङ्ग्य, देशात्मबोधक, भक्तिरसात्मक और समाज-संस्कारात्मक कई गीत, जो ओड़िशा की पुर-पल्लियों में भी समादृत हैं । समस्त विश्व को मधुमय और अमृतमय दर्शानेवाले कवि गंगाधर वास्तव में सारस्वत गगन के एक अतुलनीय दीप्तिमान् ज्योतिष्क हैं ।

॥ २ ॥

‘तपस्विनी’ महाकाव्य गंगाधर की रचनाओं में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है । श्रीरामचन्द्र की वीर-गाथा का व्याख्यानकारी महान् संस्कृत आदिकाव्य रामायण की कथावस्तु पर आधारित ‘तपस्विनी’ कवि गंगाधर की एक अनुपम कृति है । महर्षि-वाल्मीकि-आश्रम में श्रीराम-पत्नी सीतादेवी का निर्वासनोत्तर जीवनयापन काव्य का मुख्य विषय है । करुणरस-प्रधान एकादश-सर्ग-युक्त यह काव्य ‘वाल्मीकि-रामायण के उत्तरकाण्ड’, कालिदास-कृत ‘रघुवंश’ महाकाव्य और भवभूति-प्रणीत ‘उत्तररामचरित’ नाटक से प्रसंगानुरूप प्रभावित है । परन्तु मौलिक उद्भावना, विषयवस्तु-संयोजना, वर्णना-शैली, शब्दच्छटा, सांगीतिक मधुरिमा और सरसता से यह काव्य कवि गंगाधर की स्वकीय मौलिकता का प्रद्योतक है । ओड़िआ के चतुर्दशाक्षर, रामकेरी, बंगलाश्री, चोखि, रसकुल्या, कलहंस-केदार, केदारकामोदी, नटवाणी, कल्याण-पड़िताल आदि सुमधुर छन्दों तथा रागों में काव्य की रचना की गयी है । प्राचीन और आधुनिक ओड़िआ छन्दों का सुसमन्वय प्रतिष्ठित है कवि की इस कीर्त्तिशालिनी कृति में ।

ओड़िआ भाषा के उत्कर्ष प्रतिपादन तथा ओड़िआ साहित्य की समृद्धि के लिये कवि ने ‘तपस्विनी’ महाकाव्य के प्रणयन से अशेष ख्याति प्राप्त की । ओड़िआ साहित्य के कविवर राधानाथ राय, व्यासकवि फकीरमोहन सेनापति और पल्लीकवि नन्दकिशोर बल प्रमुख गुणग्राही विद्वान् कवियों की प्रेरणा ने कवि गंगाधर को सारस्वत दिशा में अधिक उत्साहित किया था ।

भारतीय संस्कृति में पली एक नारी के महनीय चारित्रिक विश्लेषण के लिये कवि ने १९१४ में ‘तपस्विनी’ की रचना की थी । १९१५ में ‘तपस्विनी’ का प्रथम संस्करण प्रकाशित हुआ । अब तक कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं । निर्वासन को अपना भाग्य-दोष मानकर रामचन्द्र की प्राणप्रिया सीता ने पतिभक्ति को कैसे दृढ़तर और उच्चतर बनाया था, फिर वनवास को पति-हितसाधिनी तपस्या का रूप देकर कैसे तपस्विनी का जीवन बिताया था, इन विषयों का वर्णन कवि का मुख्य उद्देश्य है । ‘तपस्विनी’ काव्य के ‘मुखबन्ध’ में कवि ने आशा व्यक्त की है कि पाठक अपने अपने हृदय-स्थित सीता के उज्ज्वल, निर्मल तथा पवित्र चरित्र-चित्रित स्मृतिपट का एक बार उद्घाटन करके नारी-हृदय की प्रगति विधान करेंगे ।

[‘तपस्विनी’ काव्य की लोकप्रियता का वर्द्धन करने मैंने हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत - तीनों भाषाओं में इसके सम्पूर्ण पद्यानुवाद किये हैं । प्रस्तुत लेख में उद्धृत ‘तपस्विनी’ की पंक्तियाँ सम्बलपुर विश्वविद्यालय द्वारा २००० में प्रकाशित मेरे हिन्दी-अनुवाद से ली गयी हैं ।]

॥ ३ ॥
कवि गंगाधर द्वारा प्रयुक्त ‘तपस्विनी’ शब्द विशेष रूप से महाकवि-कालिदास-रचित ‘रघुवंश’ काव्य के चतुर्दश सर्ग के ‘तपस्वि-सामान्यमवेक्षणीया’ और ‘साहं तपः सूर्य-निविष्ट-दृष्टिः’ श्लोकांश से अपनाया गया है । मिथ्या अपवाद के कारण राजा रामचन्द्र द्वारा परित्यक्ता होकर भी सीता सामान्य तपस्वी की भाँति, राज्ञी की भाँति नहीं, राज-कृपा की आशा रखती हैं ‘रघुवंश’ काव्य में । कवि गंगाधर ने ‘तपस्वी’-शब्द के स्त्रीलिंग में ‘तपस्विनी’ शब्द का प्रयोग किया है सीता के लिये । ‘तपस्विनी’ काव्य सीता की निर्वासनोत्तर करुण कहानी को लेकर रचित होने पर भी ओड़िआ साहित्य में एक ‘लघु रामायण’ का स्वरूप है, चूँकि तापसी-सखी के समक्ष सीता ने अपनी वाल्यावस्था से लेकर निर्वासन तक सारी रामायणी कथाएँ सुनाई हैं और अगली घटनाएँ काव्य की मुख्य कथावस्तु है । रामचरित के आधार पर ‘रामायण’ के नामकरण की भाँति मुख्य रूप से सीताचरित के आधार पर गंगाधर-प्रणीत इस काव्य को एक ‘सीतायन’ कहा जा सकता है ।

ग्यारह सर्गों में ग्रथित ‘तपस्विनी’ काव्य का विषय सर्गानुक्रम से संक्षेपतः निम्नोक्तप्रकार है । कवि गंगाधर ने निर्विघ्न सफल रचना के लिये भारतीय काव्य-परम्परा-सम्मत मंगलाचरण की उपस्थापना की है । विशेषता यह है कि सर्वप्रथम भारती देवी की अर्चना जिज्ञासात्मिका है इस तरह :

‘कौन तू ज्योतिर्मयी ?
वेश तेरा पावन समुज्ज्वल ;
इन्द्रनीलमणि-कान्ति-जयी
सुन्दर हैं तेरे कुन्तल ॥


तेरा शुभ्र सूक्ष्म परिधान
भेदकर निकली,
हृदय में कर रही आह्लाद प्रदान
कान्ति कलेवर की उजली ॥


तू चाँदनी घनी होकर
क्या बन गयी है शरीराकार ?
लेट रहा तेरे पैरों पर
केशों के व्याज अन्धकार ॥’


प्रसंगतः कवि ने विषय-वस्तु की सूचना दी है इसप्रकार :-

‘वाल्मीकि-आश्रम की ओर मन है दौड़ चला,
करने निर्वासिता सीता के दर्शन ।
जीर्ण हृदय उन्होंने सीं लिया कैसे भला ?
किसके साथ कैसे बिताया जीवन ?


अयि कृपावति !
कृपया तू दे शक्ति ।
पवित्र हो जाये मेरा मन देखकर
और हाथ लिखकर ॥’


तदुपरान्त गंगा-तट पर वाल्मीकि-आश्रम के पास सीता-निर्वासन की दुःखभरी घटना प्रारंभ होती है । सजीव प्रकृति असहाया सीता के प्रति समवेदना प्रकाशित करती है ।

द्वितीय सर्ग में, रामप्राणा निर्वासिता सीता को महामुनि वाल्मीकि से पितृ-स्नेह और वृद्धा तापसी अनुकम्पा से माता का प्यार प्राप्त होता है शान्ति-रानी-शासित आश्रम-राज्य में । तृतीय सर्ग में, सीता-परित्याग के उपरान्त श्रीराम के मानसिक द्वन्द्व और राज्य-शासन में अनासक्त भाव की वर्णना उपलब्ध होती है । सीता और राम की विरहावस्था ने इसमें मार्मिक रूप धारण किया है । चतुर्थ सर्ग की उषा-वर्णना सर्वाधिक लोकप्रिय है । कमनीय शान्त प्रकृति सीता को साम्राज्ञी के राजकीय सम्मान से विभूषित करती है । सूर्योदय की सूचना देनेवाली उषादेवी के प्रति सीता की भक्ति, सीता के प्रति तमसा-नदी का मातृ-प्रेम और वनलक्ष्मी के प्रति सीता की सखी-प्रीति अत्यन्त रोचक, मधुर और हृदयस्पर्शी है ।
पञ्चम सर्ग में, वसन्त ऋतु का मनमोहक चित्रण और सीता के प्रति तापसी अनुकम्पा का उपदेश सन्निवेशित है । षष्ठ सर्ग में, सीता तापसी-सहेली के सम्मुख अपनी वाल्यावस्था से वनवास तक सारी पिछली घटनाएँ सुनाती हैं । सप्तम सर्ग में, वही क्रम चलता रहता है निर्वासन की घटना पर्यन्त । अष्टम सर्ग में, ग्रीष्म ऋतु की वर्णना के साथ सुन्दर प्रकृति-चित्रण पाठक-मन को आकर्षित कर लेता है । चित्रकूट, महानदी, गोदावरी और अयोध्या सजीव व्यक्ति के रूप में सीता के मनश्चक्षु के समक्ष उपस्थित होकर अपनी अपनी दीनता और समवेदना प्रकट करते हैं । नवम सर्ग की वर्षावर्णना में प्रकृति सीता के पुत्र-जन्म पर आनन्दोत्सव मनाती है । दशम सर्ग में, कुश-लव की वाल्यक्रीड़ा, शिक्षा तथा संगीत गान के साथ वीणावादन की मुख्य घटनाएँ चित्रित की गयी हैं ।

अन्तिम एकादश सर्ग में, महर्षि वाल्मीकि के मन में राम-शासन-विषयक भावना, राम के उत्तराधिकारी के रूप में यमज कुमारों की योग्यता और अश्वमेध यज्ञ के शुभ अवसर पर उपस्थित होने के लिये वाल्मीकि को श्रीरामचन्द्र द्वारा निमन्त्रण आदि के सरस चित्रण पाये जाते हैं । महाराज रामचन्द्र को सीता का पत्र इस सर्ग में कवि गंगाधर की विशिष्ट पहचान है । यज्ञ-वृत्तान्त सुनकर सीता चिन्तित दिखाई पड़ती हैं महारानी की मर्यादा को लेकर । भारतीय समाज और परम्परा के अनुसार यज्ञ-स्थल पर यजमान के साथ धर्मपत्नी की उपस्थिति अनिवार्य रहती है । पत्नी है पति की सहधर्मिणी । सीता आँसूभरे नयनों में पत्र लिखती हैं अपने प्राणेश्वर महाराज रामचन्द्र को । उनके मन में सन्दिग्ध भावना जाग उठती है कि श्रीराम ने द्वितीय विवाह किया होगा यज्ञानुष्ठान में सहधर्मिणी की निश्चित उपस्थिति हेतु । उन भाग्यवती दूसरी नयी रानी की पूर्वतपस्या को सीता सीखना वाहती हैं । बाद में सीता प्रच्छन्न आनन्द में डूब जाती हैं , जब कुश-लव के मुखों से सुनती हैं कि श्रीराम ने सीता की स्वर्ण-प्रतिमा को सहधर्मिणी बनाकर यज्ञवेदी पर स्थापित किया है । हस्तलिखित पत्र छुपाकर जानकी अपने प्रियतम प्रभु से आन्तरिक क्षमायाचना करती हैं । वाल्मीकि और सीता दोनों से रामायण गान आदि भविष्य कार्यक्रम के बारे में यमज कुमार उपदेश प्राप्त करते हैं । निद्रा और योगमाया सती सीता को गोद में सुलाने पर्णशाला के भीतर प्रवेश करती हैं । सीता रामचन्द्र के राज्याभिषेक का दर्शन करती हैं महारानी के रूप में अपने साथ । इस मंगल अवसर पर देव-गन्धर्वादि पुष्पवृष्टि करते हैं । ‘जय सीताराम’ ध्वनि से व्योममण्डल के साथ समग्र भुवन गूँज उठता है । सती सीता इस आनन्दमय दृश्य को देखकर मुग्ध हो जाती हैं । ‘तपस्विनी’ काव्य यहीं पर पूर्णता प्राप्त होता है ।

॥ ४ ॥

संस्कृत के महाकवि कालिदास और अंग्रेजी के वाड़्‌स्वार्थ की तरह गंगाधर मेहेर ओड़िआ साहित्य के ‘प्रकृति-कवि’ माने जाते हैं । कवि गंगाधर ने अपनी प्रतिभा की आँखों से प्रकृति के अन्तःस्वरूप का सूक्ष्म तथा गहरा निरीक्षण किया है । कवि की समस्त कृतियों में बाह्य प्रकृति तथा अन्तःप्रकृति का मनोरम आलेख्य अंकित हुआ है । विशेष रूप से ‘तपस्विनी’ काव्य में प्रकृति-चित्रण अत्यन्त मार्मिक है । प्रकृति की भीम, कान्त, करुण, सौम्य और उदार मूर्त्तियों में सीता के प्रति अपूर्व स्नेह-सहानुभूति व्यक्त की गयी है, अतिशय भावोद्दीपक, रस-पेशल तथा हृदयावर्जक रूप में ।

प्रथम सर्ग में वाल्मीकि-आश्रम के पास परित्यक्ता भूपतिता गर्भवती सीता की दुर्दशा देखकर संवेदनशीला प्रकृति भीम-रूप धारण करती है । उदाहरण स्वरूप :-

‘नियति के विरुद्ध
छेड़ने युद्ध
प्रबल गरज उठा ले तलवार
ताल-तरु हाथ में अपने ।
मानो निकाला उसने
पत्र का तीर,
हिलाकर बारबार
बया-नीड़ का तूणीर ॥’


द्वितीय सर्ग में, स्वामी-विरहिता पतिप्राणा सीता को जब वाल्मीकि प्रबोधना देते हैं, उसी प्रसंग पर सागर के प्रति नदी की स्वाभाविक प्रीति का दृष्टान्त अत्यन्त मार्मिक है । कवि के वर्णन में :-

‘सागर के प्रति
सरिता की गति
रहती स्वभाव से ;
जब शिला-गिरि-संकट
सामने विघ्नरूप हो जाते प्रकट,
उन्हें लांघ जाती ताव से ।

भूल जाती सब
पिछली व्यथाएँ सागर से मिलकर ।
दोनों के जीवन में तब
रहता नहीं तनिक-भी अन्तर ॥


संयोगवश यदि बीच में उभर
ऊपर को भेदकर
छिन्न कर डालता बालुकास्तूप
सरिता और सागर के हृदय को किसी रूप,
वह स्रोतस्वती
मर तो नहीं सकती ;

सम्हालती अपना जीवन-भार
ह्रद-रूप बन हृदय पसार ॥’


तृतीय सर्ग के प्रारंभ में कवि की लेखनी से प्रकृति-चित्रण हृदयहारी प्रतिभात होता है । गंगाधर की काव्यिक कल्पना में सायंकालीन वर्णन इसप्रकार है :-

‘भागीरथी-तट पर लक्ष्मण
वैदेही को जब त्याग चले,
ससिन्धु वसुन्धरा में खरांशु-किरण
फैली थी विमल गगन के तले ॥

राम-रमणी की दुर्दशा देव-राज्य को होगी दृश्य,
तो लज्जा लगेगी अवश्य ।
दिवाकर ने करके इस बात का ध्यान
मानो दी वह धवल जवनिका तान ॥


इस रहस्य को जानकर
बाहर दिखलाने दोष अंशुमान्-वंश का,
प्रदोष ने उठा दी सत्त्वर
धरा-पृष्ठ से वही जवनिका ॥’


चतुर्थ सर्ग में नैसर्गिक शोभा-सम्पन्न प्रभात-वर्णन कवि की भावुकता का अनुपम परिचायक है । वाल्मीकि-आश्रम पर उषा का मधुर स्वरूप कवि की अभिव्यक्ति में :-

‘समंगल आई सुन्दरी
प्रफुल्ल-नीरज-नयना उषा,
हृदय में ले गहरी
जानकी-दर्शन की तृषा ।
नीहार-मोती उपहार लाकर पल्लव-कर में,

सती-कुटीर के बाहर
आंगन में खड़ी होकर
बोली कोकिल-स्वर में :
‘दर्शन दो सती अरी !
बीती विभावरी ॥’


गैरिक-वस्त्रधारिणी सौम्या योगेश्वरी के रूप में उषा की उत्प्रेक्षा की गयी है निम्न पंक्ति में :-


‘अरुणिमा कषाय परिधान,
सुमनों की चमकीली मुस्कान
और प्रशान्त रूप मन में जगाते विश्वास :
आकर कोई योगेश्वरी
बोल मधुर वाणी सान्त्वनाभरी,
सारा दुःख मिटाने पास
कर रही हैं आह्वान ।
मानो स्वर्ग से उतर
पधारी हैं धरती पर
करने नया जीवन प्रदान ॥’


प्रकृति और सीता परस्पर सम-दुःखसुखभागिनी हैं । प्राय प्रत्येक सर्ग में प्रकृति का वर्णन रम्य तथा रोचक है । वसन्त-ग्रीष्म आदि ऋतुओं का चित्रण अतिशय हृदयरञ्जक है । प्रकृति के सारे विभाव कवि की लेखनी में सजीव, सरस और मानवायित हैं । चतुर्थ सर्ग का और एक उदाहरण उल्लेखनीय है, सीता के प्रति वनलक्ष्मी का सख्यपूर्ण आदर । आश्रम के उपवन में कविकल्पिता वनलक्ष्मी सीता के समक्ष आन्तरिक भाव व्यक्त करती है इसप्रकार :-


‘जा रही थी जब लौट चली
पुष्पकारूढ़ तू गगन-मार्ग पर,
खड़ी मैं तब ले पुष्पाञ्जली
हरिण-नयनों में शोकभर
ऊपर को निहार
तुझे मयूरी की बोली में पुकार
रही थी बड़ी चाह से

लम्बी राह से ।
अरी प्यारी !
सहेली की बात मन में करके याद
क्या तू आज पधारी
इतने दिनों बाद ?’


अष्टम सर्ग में कवि=कल्पना की माधुरी सहृदय जनों का हृदय खींच लेती है । सीता-विरहिता अयोध्या-राजलक्ष्मी का पत्र अयोध्या पाठ करती है सीता के सम्मुख । उदाहरण स्वरूप :-


‘सखि ! मैं रजनी ;
तू थी चाँदनी ।
मेरे प्रफुल्ल नयन-कुमुद मूँद
बिदाई तूने ले ली ।
तेरे बिना अरी प्यारी !
और नहीं मेरे सुख की एक भी बूँद ।

बन गई है तेरी यह सहेली
जैसे आभरण-शून्या नारी ॥’


इन उदाहरणों के अतिरिक्त कई रमणीय चित्रण काव्य में प्रसंगानुसार प्रस्तुत किये गये हैं रंगाजीव कवि गंगाधर की मधुर लेखनी से । ऊपर उद्धृत पंक्तियाँ निदर्शन मात्र हैं ।


॥ ५ ॥


अप्रतिम-प्रतिभाशाली कवि गंगाधर कर्मयोगी हैं और भाग्यवादी भी । वे आशावादी हैं, निराशावादी कभी नहीं । कर्मयोगी कवि का जीवन-दर्शन ‘तपस्विनी’ में प्रसंगानुकूल प्रतिफलित हैं । सीता के आचरण और निर्वासन के बारे में भी कर्म और भाग्य की भूमिका महत्त्वपूर्ण है । गंगाधर की सीता निर्वासन को अपना भाग्य-दोष मानकर आत्म-समीक्षण करती हैं । कवि के मौलिक चिन्तन यहाँ उल्लेखयोग्य हैं । पञ्चवटी वन में ‘रक्षा करो लक्ष्मण’ पुकार सुनने के बाद श्रीराम की खोज के लिये निर्दोष लक्ष्मण को तिरस्कार करना, लंका के अशोक वन में रावण द्वारा प्रदर्शित माया-राम-मस्तक में सत्य भावना करके भी जीवित रहना और अयोध्या लौटने के उपरान्त पति-चरण-सेवा को हेय समझ गंगा-तट पर आश्रम-दर्शन की अभिलाषा प्रकट करना - ये तीन दोष सीता के मन में अपने योग्य निर्वासन के कारण हैं । कालिदास की सीता की भाँति गंगाधर की सीता निर्वासन को अपने दुष्कृतों का फल सोच, समस्त दुःख झेल, अगले जन्मों में फिर श्रीराम को ही पति-रूप में प्राप्त करने की कामना रखती हैं ।


वाल्मीकि-रामायण के अनुसार, लंका में अग्निपरीक्षा के समय श्रीराम की कठोर वाणी सुनने के पश्चात् सीता के मुख से भी कुछ सकरुण कटु बातें निकलती हैं (प्राकृतः प्राकृतामिव) । गंगाधर की सीता अपने पतिव्रता धर्म को अपने संग सशरीर अग्नि में समाने के लिये दृढ़ मनोबल के साथ निडर बातें सुनाती हैं । अग्नि में शरीर के भस्म होने पर खार को किसी तरु-मूल में खाद बनवाकर उससे वर्द्धित उस तरु के काष्ठ से प्रभु श्रीराम के लिये पादुका प्रस्तुति की प्रार्थना करती हैं । सती सीता की पतिप्राणता और पति-भक्ति ने उन्हें उच्चतम नारी-आसन पर अधिष्ठित किया है ।


सर्वंसहा धरित्री की कन्या सती सीता त्याग और सहनशीलता की अद्वितीय प्रतिमा हैं । सीता के चारित्रिक उत्कर्ष की और एक विशिष्ट दिशा यह है की निर्भीक, पवित्र और महनीय मनोवृत्ति लेकर सीता अपने पति श्रीरामचन्द्र में सम्पूर्ण समर्पित रहती हैं । आत्मविश्वास ने उनके प्रेम को महान् बनाया है । पतिव्रता सीता के मन में श्रीराम की मूर्त्ति सदैव अम्लान और अटूट रहती है, जैसे पञ्चम सर्ग की वर्णना में :-


‘तापस-तापसियों के भरपूर
स्नेह-सुख ने भगा दिया दूर
समस्त व्यथाओं को सती-मन की ।
स्मृति की राह में उनकी,
विलासमय राजसुख वहीं
एक बार भ्रमवश भी आया नहीं ।
उनके विमल हृदय-सरोवर में अविराम
विहर रहे राम-राजहंस अभिराम ॥’


सीता पद्मिनी नायिका हैं और ‘तपस्विनी’ रूप में समस्त दिव्य गुणों की खान । कवि गंगाधर ने प्राय सभी सर्गों में सीता के लिये ‘सती’ शब्द का बहुल प्रयोग कर उनके समुज्ज्वल निष्कलंक चरित्र का महत्त्व दर्शाया है । भवभूति-वर्णिता सीता की भाँति गंगाधर की सीता करुण रस की मूर्त्ति हैं । संस्कृत वाङ्मय में भवभूति आद्य कवि-नाट्यकार हैं, जिन्होंने ‘एको रसः करुण एव’ कहकर एकमात्र करुण रस को अन्य सभी रसों का आधार बतलाया है । ओड़िआ साहित्य में गंगाधर सीता की निर्वासनोत्तर दुःखभरी घटनाओं को मार्मिक रूप देने में प्रथम तथा सफल काव्यकार हैं ।


करुण-रस के प्रसंग पर कुछ कवि-मनीषियों की उक्तियाँ यहाँ स्मरणीय हैं । अंग्रेजी-कवि पी. बी. शेली (P.B.Shelly) ने यथार्थ कहा है : ‘Our sweetest songs are those that tell of saddest thought’ (हमारी मधुरतम गीतियाँ वे हैं जो सर्वाधिक दुःखभरी भावना को व्यक्त करती हैं) । प्रसिद्ध हिन्दीकवि सुमित्रनन्दन पन्त की उक्ति भी उल्लेखनीय है :-

'वियोगी होगा पहला कवि
आह से उपजा होगा गान ।
उमड़कर आँखों से चुपचाप
बही होगी कविता अनजान ॥' 


शृंगार-रसमयी कविता से कहीं बढ़कर करुणरसमयी कविता विशेष आकर्षणीय होती है । प्रख्यात आलंकारिक-शिरोमणि विश्वनाथ कविराज ने यथार्थरूप से अन्य रसों की भाँति करुण-रस की आनन्दमयता का प्रतिपादन किया है । अन्य रसों की अपेक्षा करुण रस में हृदयस्पर्शी प्रभाव अधिक मात्रा में रहता है । वास्तव अनुभव ही इसका प्रमाण है । एकरसवादी भवभूति की शब्द-संयोजना पाठक-हृदय में अपूर्व स्पन्दन तथा आनन्द जगाती है । कवि गंगाधर की कविता में भी हृदय-द्रावक उपादान गहरे समाये हैं । सीता की करुण गाथा का वर्णन करते हुए कवि गंगाधर दशम सर्ग में कहते हैं :-


‘रस-रत्नभरा काव्य-सानुमान्,
जहाँ राम-मृगराज विराजमान ।
रावण-गज की रुधिर-धार झर-झर
बहती बनकर निर्झर ।
रोतीं सिंही आश्रय कर गिरि-कन्दरा
झेल दन्ताबल के दन्ताघात का दुःख गहरा ॥’


कवि गंगाधर की लेखनी में प्रासंगिक शृंगार स्निग्ध, निर्मल, पावन, सम्मार्जित, माधुर्य-सम्पन्न और आनन्दमय भाता है । सीता का वनफूलेश्वरी-रूप ऐसे समुज्ज्वल प्रेम का मनोरम निदर्शन है, जिसमें शृंगार की सात्त्विकता सहृदय-वेद्य है ।


॥ ६ ॥


मर्यादा-पुरुषोत्तम सीतापति श्रीरामचन्द्र का व्यक्तित्व असाधारण, अनुपम तथा महनीय है । जैसे उनके प्रति सीता का प्रेम अनन्य और उत्सर्गीकृत है, वैसे सीता के प्रति उनका भी । गृहस्थ-धर्म के पोषक श्रीराम ने केवल लोकनिन्दा के कारण ही अपने सदन से पत्नी सीता को त्यागा है, अपने मन से नहीं । पत्नी-विरह में शोकाकुल होकर उन्होंने राजसिंहासन को तुच्छ समझा है । प्रजारञ्जन-रूप राजधर्म के पालन के लिये अपने वैयक्तिक तथा पारिवारिक सुख खोये हैं । फिर भी उनके हृदय में प्राणप्रिया पद्मिनी सीता सदैव विद्यमान हैं और श्रीराम का मन-भ्रमर सरस पद्म-मकरन्द के आस्वादन में तन्मय है । तृतीय सर्ग में, प्रसंगानुसार विरह-व्याकुल श्रीराम अपने इन्द्रियों को समझाते हैं इन पंक्तियों में :-


‘कहता हूँ और एक बात,
तुमलोग मन के साथ
सब सम्मिलित होकर
चलो हृदय सरोवर ।
उधर अनन्त दिनों तक
रमते रहोगे रस-रंग में अथक ।

वहाँ खिली है नयी पद्मिनी
मेरी जीवन-संगिनी ।
स्मरण का सूरज वहीं सदा जगमगाता,
अस्त कभी नहीं जाता ॥’


गंगाधर की कविता में श्रीरामचन्द्र एक आदर्शवादी प्रजावत्सल राजा तथा सामाजिक त्यागी गृहस्थ हैं । आदर्श पति श्रीराम और आदर्श साध्वी पत्नी सीता युग-युग चिर-स्मरणीय और पूजास्पद हैं । समाज में नारी-मर्यादा की प्रतिष्ठा हेतु गंगाधर की कृति महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है । नायक-नायिकाओं के उत्कर्ष वर्णन के साथ अन्यान्य चरित्रों के चित्रण में भी कवि की लेखनी प्रशंसनीय है ।


‘रघुवंश’ में निर्वासिता सीता की रुलाई की खोज करते हुए स्वयं वाल्मीकि महर्षि उनके पास पहुँच सान्त्वना देते हैं (तामभ्यगच्छद् रुदितानुसारी कविः कुशेध्माहरणाय यातः) । गंगाधर ने इस प्रसंग पर अपनी मौलिकता का सुकुमार प्रयोग किया है । वनभूमि में परित्यक्ता सीता की असहायता और विलाप-दुःखभरी अवस्था से सर्वप्रथम प्रत्यक्ष परिचित होती हैं आश्रम की मुनिकुमारियाँ । वे रोदन-रता सीता के पास पहुँचकर उनके दुःखों से अत्यन्त व्याकुल हो उठती हैं । उनमें से एक मुनिकन्या तुरन्त वाल्मीकि के समीप जाकर सूचना देती है और तत्पश्चात् महर्षि के साथ अनेक मुनिकुमार तथा अन्य मुनिकन्याएँ सब मिलकर सीता के सम्मुख पहुँचते हैं । सीता के साथ मुनिकुमारियों के प्रथम साक्षात्कार में निहित है कोमल-हृदया नारी के प्रति कोमल नारी-जाति की संवेदनशीलता । कवि गंगाधर ने करुणभावपूर्ण इस घटना में अपनी सुकुमार सूक्ष्मभावना का उपयुक्त विनियोग किया है ।


गंगाधर की कवि-प्रतिभा की और एक अनुपम सुकुमार देन है वाल्मीकि-आश्रम-स्थित ‘अनुकम्पा’ नाम्नी वृद्धा ब्रह्मचारिणी, जो मातृसमा ममतामयी यत्नशीला हैं पुत्री-तुल्या गर्भवती सीता के लिये । प्रसंगानुसार कवि ने अपनी साहित्यिक कृति में नाटकीय छटा प्रस्तुत कर भावुक-मन को उल्लसित करने का सफल प्रयास किया है ।


॥ ७ ॥


कवि गंगाधर की भाषा चमत्कारिणी तथा साक्षात् मर्मस्पर्शिनी है । उनकी कविता में भाव और भाषा के बीच मधुर सामञ्जस्य परिलक्षित होता है । काव्य-प्रणयन के लिये कवि ने सीता की दुःख-पर्यवसायी कथावस्तु को अपनाया है । इसमें विशेषता यह है कि अत्यन्त मार्मिक ढंग से काव्य का सुखान्त परिवेषण किया गया है । कवि की शैली प्रसादमयी, सुरुचि-सम्पन्न, कला-कुशला और आनन्ददायिनी है । सुललित सांगीतिक मधुर पद-विन्यास के साथ प्रसंगानुरूप उपमा-रूपक-अनुप्रासादि विविध काव्यालंकारों से विभूषित यह काव्य कवि गंगाधर के प्रतिभोत्कर्ष का अनुपम निदर्शन है । प्रसंगानुसार कवि ने ओड़िशा की ‘महानदी’-‘अंग’-‘इब’-‘तेल’ आदि नदियों की एक भौगोलिक सूचना दी है । सागर-सरिता के अटूट प्रेम-बन्धन के प्रसंग पर ओड़िशा के ‘चिलिका’ ह्रद का दृष्टान्त परोक्ष रूप में अन्तर्निहित किया गया है ।


उपसंहार में इतना कहा जा सकता है कि मानवीय सूक्ष्म भावों के सच्चे विश्लेषक तथा प्रकृति के निपुण सफल चित्रकार के रूप में कवि गंगाधर मेहेर वाग्‌देवी के सौभाग्यशाली वरपुत्र हैं । उनका सारस्वत अनमोल रत्न-रूप यह ‘तपस्विनी’ काव्य अपने काव्य-गुणों से सहृदय सुधीजनों के अन्तःकरण को रसाप्लुत करता रहेगा, यही पूर्ण विश्वास है ।


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[सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत ‘ तपस्विनी ’
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण : २००० ख्रीष्टाब्द ]
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