Friday, December 2, 2011

Biodata (English-Hindi-Sanskrit-Oriya) : Dr. Harekrishna Meher

Dr. HAREKRISHNA MEHER
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My Works & Achievements : Biodata Details :
http://hkmeher.blogspot.com/2007/07/my-biodata.html
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English : Brief Biodata :
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Hindi : Brief Biodata :
http://hkmeher.blogspot.com/2009/02/biodata-hindi-harekrishna-meher.html
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Sanskrit : Brief Biodata :
http://hkmeher.blogspot.com/2010/02/brief-biodata-sanskrit.html
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Oriya : Brief Biodata :
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Places where cited, referred, reviewed, discussed about Dr. Harekrishna Meher and his works in Research fields and others :
http://hkmeher.blogspot.com/2010/06/places-where-d,rharekrishna-meher-and.html
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Books (Some Images) :
http://hkmeher.blogspot.com/2010/06/images-of-main-books-of-harekrishna.html

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Wikipedia :
http://hi.wikipedia.org/wiki/हरेकृष्ण_मेहेर 

Wikipedia : Matrigitikanjalih (Sanskrit Kavya) : 
Wikipedia : Philosophical Reflections in the Naisadhacarita (Ph.D. Thesis) : 

List of Indian Poets: Sanskrit- Modern Poets: Wikis: Full Wiki : 
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Book Ref. (WorldCat) :
http://www.worldcat.org/wcidentities/lccn-n80-41482
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Biography (PoemHunter.com) :
http://www.poemhunter.com/harekrishna-meher/biography
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Biodata (Srijangatha) :
http://www.srijangatha.com/Co_HKMehre_2k10
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Biodata (Muse India) :
http://museindia.com/authorprofile.asp?myr=2008&issid=21&id=728
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Biodata (AakharKalash) :http://aakharkalash.blogspot.com/2010/05/blog-post_05.html
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Facebook  (DrHarekrishna Meher) : 
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Dr. HAREKRISHNA MEHER

Retired Sr. Reader and Head, 
Post-Graduate Department of Sanskrit,  
Gangadhar Meher Autonomous College 
(College with Potential for Excellence)
SAMBALPUR – 768004. Orissa (India)

Mobile : +91-94373-62962 
e-mail :  meher.hk@gmail.com
website : 
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Monday, November 28, 2011

Complete Hindi Version : ‘Tapasvinī’ Kāvya (सम्पूर्ण हिन्दी ‘तपस्विनी’ काव्य/डॉ. हरेकृष्ण मेहेर)

Original Oriya Mahākāvya ‘TAPASVINĪ’ of Poet Gańgādhara Meher (1862-1924).
Complete Tri-lingual Translations (in Hindi, English and Sanskrit)
By : Dr. Harekrishna Meher.
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Complete Hindi Version of ‘ TAPASVINĪ ’ is presented here.

Hindi Translation Book ‘Tapasvinī’ by Dr. Harekrishna Meher.
Published by :
Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa, First Edition : 2000.
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[All Eleven Cantos have been taken here from this Hindi Book.]

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Hindi Tapasvinī Mahākāvya
[Contents]
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तपस्विनी’ महाकाव्य
मूल ओड़िआ रचना : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)
सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर


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ग्रन्थ-सूची
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प्राक्‌कथन :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/08/tapasvini-kavya-praak-kathan.html

तपस्विनी : एक परिचय :
http://hkmeher.blogspot.com/2008/07/tapasvini-ek-parichaya-harekrishna_27.html
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/09/tapasvini-ek-parichaya-drharekrishna.html

मुखबन्ध :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/08/hindi-tapasvini-preface.html
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प्रथम सर्ग :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/08/hindi-tapasvini-kavya-canto-1.html

द्वितीय सर्ग :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/08/hindi-tapasvini-canto-2.html

तृतीय सर्ग :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011_08_01_archive.html

चतुर्थ सर्ग :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/08/tapasvini-kavya-canto-4.html

पञ्चम सर्ग :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/08/hindi-tapasvini-canto-5.html

षष्ठ सर्ग :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/09/hindi-tapasvini-kavya-canto-6.html

सप्तम सर्ग :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011_09_01_archive.html

अष्टम सर्ग :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/11/hindi-tapasvini-kavya-canto-8.html

नवम सर्ग :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/11/hindi-tapasvini-kavya-canto-9.html

दशम सर्ग :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/09/hindi-tapasvini-kavya-canto-10.html

एकादश सर्ग :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/11/hindi-tapasvini-kavya-canto-11.html


= ** सम्पूर्ण ** =


[ सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत "तपस्विनी".
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर.
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण २००० ख्रीष्टाब्द.]


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Other Related Links :

Complete English ‘TAPASVINI’ Kavya : HKMeher Blog :
http://hkmeher.blogspot.com/2011/10/tapasvini-kavya-complete-english.html
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Complete English ‘TAPASVINI’ Kavya : Tapasvini Blog :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/10/complete-english-tapasvini.html

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Complete Hindi ‘Tapasvini’ Kavya in HKMeher Blog :
http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/complete-hindi-tapasvini-kavya.html
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Gangadhara Meher’s Tapasvini Kavya : A Glimpse :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/11/poet-gangadhara-mehers-tapasvini-kavya.html
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Articles on My Hindi-English-Sanskrit Translations of Tapasvini Kavya :
http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/my-hindi-english-sanskrit-articles-on.html
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Saturday, November 26, 2011

Hindi Tapasvini Kavya Canto-11 (‘तपस्विनी’ काव्य एकादश सर्ग/ हरेकृष्ण मेहेर)

TAPASVINI
Original Oriya Epic Poem
By : Poet Gangadhara Meher (1862-1924)

Complete Hindi Translation by : Dr. Harekrishna Meher


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Tapasvini [Canto-11]
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[Canto- 11, the Last Canto of this epic poem, has been taken from pages 191-214 of
my Hindi ‘Tapasvini’ Book
Published by : Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa, First Edition : 2000.]
For Introduction, please see :
' Tapasvini : Ek Parichaya '
Link :
http://hkmeher.blogspot.com/2008/07/tapasvini-ek-parichaya-harekrishna_27.html
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‘तपस्विनी’ महाकाव्य
मूल ओड़िआ रचना : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)
सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर


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एकादश सर्ग
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एक दिन मेदिनी प्रदक्षिण कर
श्रम-क्लान्त दिनकर
क्षीणतेज - शरीर
नील नीर में पश्चिम वारिधि के
डूब गये गभीर,
अभिलाषी अवगाहन-विधि के ॥

छोड़ न पाकर अपना प्रियतम,
अत्यन्त दीन-कलेवर
एक पल भी रहने अक्षम
दिवस चला उनके पीछे सत्वर ॥

पति बिना पत्नी की अवस्था
क्या होती सर्वथा,
भोलीभाली नलिनी-बाला ने यह न जानकर
त्यागा नहीं अपना घर ॥

पलभर में लूटकर
रंगीन वास-कोष उसीका,
प्रदोष ने बना दिया अम्बर पर
पादास्तरण रजनी का ॥

इस प्रकार देखकर
कोमलांगी कमलिनी का अपमान,
शिरीष पादप लज्जा-जर्जर
हो गया अत्यन्त म्लान ॥

सूर्यास्त में सम्पन्न कर
अग्निदेव की सपर्या
महामना वाल्मीकि ने सादर
शिव-कृपा का स्मरण किया ॥

आश्रम में कुशासन पर
विराजे थे मुनिवर ।
सोच रहे थे मन-ही-मन
श्रीराम का सुशासन ।
साथ ही विषय
कुमारों की योग्यता का,
फिर कैसे होगा परिचय
पुत्रों के सहित पिता का ॥

‘धनुर्वेद और राजधर्म की शिक्षा के द्वार
इसी समय पहुँच चुके हैं युगल कुमार ।
तापसों के संग उभय
जब कानन में रहेंगे,
मूल्यवान् समय
तो व्यर्थ बीत जाएंगे ॥

यदि राजधर्म में कुशल
हो न पाएंगे राजकुमार,
समस्त गुण हो जाएंगे निष्फल
बन्ध्य पादप जिस प्रकार ॥

वीरत्व-विभूषण से इसी समय
मण्डित न होंगे यदि ये,
दुःसह दूषण आन पड़ेगा निश्चय
वीर-वंश के लिये ॥

कौन कह सकेगा,
दायाद-रत्न श्रीराम का
एक दिन नहीं खोजेगा
राजसिंहासन कोशल-धाम का ॥

राजसम्मान-रक्षा की क्षमता
उसी समय यदि न रहेगी,
उनकी नीति-अधमता
प्रकटित हो जाएगी ।
कैसे बिना आदर्श के युगल सहोदर
उसमें प्रवीण बनेंगे यहीं वन में रहकर ?

होते सभी दान-वीर
रघुवंशी नरेशगण विशेषरूप से ।
वही आदर्श ऋषि-कुटीर
सिखला सकेगा कैसे ?

अविकल रामरूप प्रतिबम्बाकार
अवयवधारी हैं युगल कुमार ।
दर्शन से ही रघुकुल-शेखर
अपने पुत्रों को पहचान लेंगे सत्वर ।
वहाँ वीर शत्रुघन
कर देंगे संशय मोचन ॥

पहुँचा देने पर पुत्र-युगल को वहीं
श्रीरामचन्द्र करेंगे स्वीकार,
तब हमारी होगी नहीं
निन्दा किसी भी प्रकार ॥

परन्तु अपनी प्रियतमा पत्नी को
पतिव्रता सती जानकर सही,
लोकापवाद-भय से ही
उन दोहदिनी को
भेज दिया निर्दय राजा ने
कानन में दोहद-पूरण के बहाने ॥

बारह वर्षों के अनन्तर
सन्तान की ममता
जन्मेगी उनके हृदय के भीतर,
यह सम्भव नहीं लगता ।
प्रजा के प्रति हैं किये
उन्होंने सारे पुत्र-प्रेम समर्पित ।
उसकी सम्मति इसलिये
अभी चाहेंगे निश्चित ॥

अपने विश्वास पर
जिनकी है नहीं आस्था,
उन्हें सहस्र बार कहकर
समझाने से क्या होगा सर्वथा ?
इसी विषय पर परामर्श अवश्य चाहिये
महामुनि वसिष्ठ और लक्ष्मण को संग लिये ॥’

इसी समय राजदूत ने
कृताञ्जलि हस्त से अपने,
पत्र प्रदान किया वाल्मीकि-कर में सत्वर
चरणों में प्रणिपात कर ॥

पत्र-पाठ पश्चात् मुनीन्द्र को चला पता
इष्ट सिद्धि हेतु मिल गया रास्ता ।
भेजा है निमन्त्रण राजा रघुवर ने
अश्वमेध याग में योगदान करने ॥

सोचने लगे मुनिवर,
‘विधि ने अनुकूल होकर
दिखलाया तट
भावना-पयोधि के निकट ॥

मुनिकुमार-वेश में शिष्यों के बहाने
लव-कुश को ले चलेंगे यज्ञ दिखलाने ।
यज्ञ-क्षेत्र में स्थान-स्थान करके भ्रमण
दोनों गायेंगे मधुर नव्य काव्य रामायण ॥

प्रीति-सुधा बरसाकर श्रीराम-आख्यान
अवश्य हर लेगा लोगों का चित्त ।
निहार युगल कुमार श्रीराम-समान
लोग राम-पुत्र ज्ञान करेंगे निश्चित ॥

स्वयं रघुवंश-शेखर
अपने प्रतिबिम्ब-रूप दर्शन कर
डुबा देंगे हृदय
प्रेम-पीयूष-कूप में निश्चय ॥

यदि कुण्ठित होंगे रघुकुल-तिलक
स्वीकारने अपने दोनों बालक,
उधर देवी कौशल्या
भू-लुण्ठित नहीं होंगी क्या ?

सीता का स्पर्श नहीं कर सका दशानन,
रामायण से सुन यह विवरण
होगा आनन्द-मगन
समस्त जनों का अन्तःकरण ॥

सती जनक-दुहिता
हो चुकी हैं अग्नि-परिक्षिता ।
इस कथा का श्रवण कर
पुलकित होगा नहीं किसका कलेवर ?

रामायण काव्य करेगा
भारती-ज्योति का विस्तार ।
त्रिभुवन से हट जायेगा
लोक-निन्दा का अन्धकार ॥’

मन-ही-मन इस प्रकार
मुनिवर ने किया विचार ।
हो उठा प्रफुल्ल अतिशय
आनन्द से उनका हृदय ॥

मधुर वचनों में उधर
राजदूत को विश्राम की अनुज्ञा देकर,
शिष्यगण को नियोजित किया
निभाने अतिथि-सत्‌क्रिया ॥

सानन्द मुनीन्द्र ने तदुपरान्त
सीता के पास चल बताया अश्वमेध-वृत्तान्त,
‘वत्से ! श्रीराम-दूत इधर
आया है निमन्त्रण लेकर ।
संग ले शिष्य-दल
प्रस्थान करूंगा कल ॥

उनके साथ शिष्यरूप हमारे
चलेंगे लव कुश प्यारे ।
कई मुनिजनों के करेंगे दर्शन
और पाएंगे आशीर्वचन ॥’

सती मैथिली ने समर्थन किया
महर्षि-दत्त प्रस्ताव का ।
उन्हें दृढ़ रूप से सौंप दिया
सारा दायित्व कुश-लव का ॥

अन्तेवासियों से तदुपरान्त
कहा मुनिशेखर ने :
‘जब होगा निशान्त
यात्रा करेंगे अश्वमेध अध्वर देखने ।
लव कुश के संग समस्त सहाध्यायी कुमार
पाथेय साथ ले जाओगे हो तैयार ॥

बाबा कुश लव ! साथ वीणा लेते रहोगे,
सुसंगीत संग शिक्षा सार्थक करोगे ।
जो श्रीराम हैं नायक
रामायण काव्य के,
हो चुके हैं हर्ष-दायक
तुम्हारे हृदय के,
वही श्रीराम सद्‌गुण-निधान
कर रहे हैं महायज्ञानुष्ठान ।
कई देशों से महानुभावगण
करेंगे उधर पदार्पण ॥

पधारे होंगे विभीषण
लंकापुरी-विभूषण,
असुर-संघ संग लेकर
लाँघ सुविशाल सागर ॥

भले-भले भल्लुक प्लवंग
अंगद-प्रमुख चल,
आये होंगे सुग्रीव के संग
खुशियों से मलकर वदन-मण्डल ॥

जो समझते लोष्ट-खण्ड-सा सानुमान्,
वही महावीर हनुमान्
अमित-बलवान्
विहरते होंगे वहीं सिंह-समान,
सानन्द सजाकर हृदय पर मुक्ताहार
सीता-प्रदत्त उपहार ॥

नाना-विहंग-लोममालाओं से सुन्दर
अलंकृत कर अपना अपना अंग,
आये होंगे अनेक शबर
निषादराज गुहक के संग ॥

जिन्होंने भ्रातृभक्ति-बल द्वारा
अनायास ठुकरा दिया आलिंगन प्यारा
दुर्लभ राजलक्ष्मी का,
स्थापित कर अग्रज की पादुका
राजसिंहासन पर
फलमूलाहार से बिताये चौदह वत्सर,
ऊँचा किया जीवन
जटाजूट बाँधकर,
जिसे निहारता ऊर्ध्व-वदन
हिमगिरि का तुंग शिखर,
होंगे वही भरत
वहीं श्रीराम के अनुगत,
आकाश में राकेश के समान
कीर्त्ति-कान्तिमान् ॥

क्षणजन्मा लक्ष्मण को देखोगे वहीं
संसार में जिनके सदृश दूसरा कोई नहीं ।
स्वयं वज्र-हस्त
जिसके भय से थे त्रस्त,
उस मेघनाद का घमण्ड सकल
उन्होंने पैरों से दिया है कुचल ॥

मेघनाद-निधन की खबर
कालाग्नि बन
धधक उठी प्रखर
समाकर रावण के हृदय में गहन ।
संग-संग अंग-बल की आहुति डाल
असुरेश्वर ने बना दिया उसे उग्रतर कराल ।
तपाकर उसमें प्रदीप्त शक्ति क्रोधभर
निक्षेप किया वीर लक्ष्मण पर ॥

शक्तिघात-जनित क्षतों का लक्षण
अपने उर पृष्ठ पर
धारण करके वे वीरवर
यथार्थ-नामा हैं ‘लक्ष्मण’ ॥

अक्षियों से देखोगे सामने
जो अक्षरों से देखा है तुमने ।
करोगे सबकी कथा गान
सबके सम्मुख विद्यमान ॥

श्रवण करेंगे वहाँ संगीत सुस्वर
शत-शत नरेश्वर,
साथ तपस्तेज से दीप्त-कलेवर
शत-शत यतिवर ॥

परिचय यदि कोई पूछेंगे उधर
तुम बोलोगे अवश्य :
‘हम युगल सहोदर
महर्षि वाल्मीकि के शिष्य ॥’

बुलायेंगे यदि रघुनन्दन
उनके समक्ष करोगे रामायन गायन ।
वे कौतूहलपूर्ण -हृदय
पूछेंगे यदि तुम्हारा परिचय
तुम दोनों दोगे उत्तर :
‘वाल्मीकि-शिष्य हम युगल सहोदर ॥’

यदि राजा रघुनन्दन
प्रदान करेंगे धन,
लोभ त्याग कर तुम उभय
बोलोगे सविनय :
‘हम क्या करेंगे नरेश्वर !
तापस-कुटीर में धन लेकर ?’

वाल्मीकि-मुख से करके श्रवण
वार्त्ता अश्वमेध-यज्ञ-विधि की,
वैदेही के हृदय में उसी क्षण
जाग उठी व्यथा आकस्मिकी ॥

सीता लगीं सोचने :
‘निश्चित ही रघुकुल-चन्द्र ने
बिठायी गोद में अपनी
लाकर द्वितीया पत्नी ॥

धन्य वही सीमन्तिनी
सौभाग्य-शालिनी,
जिनके तपोवृक्ष में फल बने आकर
सगर-कुल-सागर के कलाकर ॥

कहाँ किसप्रकार कौन-सी
घोर तपस्या की उन्होंने ?
अन्तःकरण मेरा अत्यन्त लालसी
उस तपश्चरण में प्रवृत्त होने ॥

कौन करेगा मुझे सूचित
उस तपश्चर्या का नियमादिक ?
करूंगी तपश्चरण निश्चित
उसीसे भी कठोर अधिक ॥

किसको पता उनकी पूर्व तपस्या का रहस्य ?
वसिष्ठ आदि महर्षिवृन्द जानते होंगे अवश्य ।
अन्यथा उन्हें महारानी चुनी कैसे ?
प्रभु ने किया होगा परिणय उनके मत से ।
तब किसी भी उपाय का प्रयोग कर
लाऊंगी निश्चय वही गुप्त मन्तर ॥’

मन में करके ऐसी भावना
सती ने आरम्भ किया विनय-पत्र लिखना :
‘शरण-वत्सल -केतन,
बैरी-वारणांकुश भीषण,
दुःख-पर्वत-पवि दर्शन
करते जिनमें ज्ञानीगण,
राजराजेश्वर के उन पावन
चरणारविन्द में करती वन्दन
यह दीन भिक्षुका
दूर से अपना शीश झुका ॥

मधु-आशा का अन्धकार
भेदन करने किसी प्रकार
कान्तार में रहकर कातर-मन
प्रेषित करती यह निवेदन ॥

हयमेध महायज्ञ में महाराज
आप स्वयं दीक्षित हो चुके ।
दर्शन दे रही होंगी आज
नवीना वामा वामांक में प्रभु के ॥

मुग्‌ध होंगी मुग्‌धा वल्लभी,
यही विचार करके
शत-गुणित बढ़ते होंगे अभी
सद्‌गुण आपके ॥

महाक्रतु में प्रदान करेंगे आप अनन्त धन
रत्न-राशि क्षौम वसन ।
पूर्ण होगी वहीं याचक-जनों की कामना ।
जागी है मेरे मन में एक याचना ॥

प्रदान करने यही भिक्षा नगण्य
कृपया आपका न होगा कार्पण्य ।
आप तो स्वयं हैं अपार
दया-रत्नमय दान-पारावार ॥

मैं कौन, जानने की नहीं आवश्यकता,
आप सदा तापसों के अशान्ति-हर्त्ता ।
रहता नहीं तापसों के प्रति
आपका अदेय कुछ ।
मैं तपस्विनी सम्प्रति,
आप न समझेंगे मुझे तुच्छ ॥

आपकी अंक-योग्या सुभगा
जो बनी हैं आज,
सभक्तिक दर्शन कर रहा होगा
जिन्हें जगत का जन-समाज,
कौन-सी घोर तपश्चर्या
पहले कभी उन्होंने की ?
कितने काल तक किधर
किस मन्त्र का जप कर ?
केवल इतनी ही सुदया
करेंगे प्रभु मुझे बताने की ।
अन्य कोई भी धन

नहीं आवश्यक मेरे लिये, हे राजन् ! ॥

कोटि अश्वमेध अध्वरों में दान
की जाती जितनी सम्पदा,
उसीसे भी समझूंगी अधिक महान्
मेरे विचार में उसे सदा ॥

और एक बात का है निवेदन,
अति अबोध हैं इस दुःखिनी के युगल नन्दन ।
पिता के अंक में उपवेशन का
सौभाग्य नहीं उनका ।
जन्म से ही ये कुमार
जानते नहीं पिता का प्यार ॥

जानते हैं रुलाने जननी का जीवन
वीणा-तन्त्री संग करके रामायण गायन ।
कौन रोएगा नहीं फिर
करके मानव-हृदय धारण ?
जिसे सुन हो जाते अस्थिर
वल्लरी-पादप-गण ॥

आपके चरित से स्वयं मोहित होकर
जा रहे हैं महर्षि के साथ दोनों सहोदर ।
दर्शन करने आपके पाद-पद्म पावन
खींच ले रहा उन्हींका मन ॥

आपके अतीत दुःखों की कथा
सुनाएंगे दोनों भ्राता,
जिसे श्रवण कर सर्वथा
हृदय इस दुःखिनी का विदीर्ण हो जाता ॥

श्रवण न करने से उसकी ओर
मन सदा दौड़ता रहता ।
दमित नहीं की जा सकती जोर
उसकी उत्सुकता ॥

हे धीर-धुरन्धर !
उसी कथा को लेकर
यदि आपका श्रवण
दिलाएगा दीना वैदेही का स्मरण,
स्वप्न ही समझ लेंगे आप उसी का प्यार
नयी प्रणयिनी का प्रफुल्ल वदन निहार ॥’

लिख रही थीं पत्र इसी तरह
विकल-हृदया सती ले अपनी गाथा ।
नेत्रनीर-झर से वह
धौत हो रहा था ॥

और लिखूंगी क्या ?
सोच रही थीं बैठ रामप्रिया ।
सहर्ष हँसते-हँसते वहाँ
पहुँच गये कुश लव ;
बोले : ‘ माँ माँ !
धन्य धन्य वे राघव,
धन्या उनकी प्रणयिनी
सती सौभाग्य-शालिनी ॥

श्रीरामचन्द्र कौशल्या-पुत्र
प्रारम्भ कर रहे हयमेध अध्वर ।
साथ ले निमन्त्रण पत्र
एक दूत आया है इधर ॥

दूत से पूछकर जाना हमने इसप्रकार,
रामचन्द्र के कारण आज धन्य यह संसार ।
लोकापवाद उन्होंने मिटा दिया
त्यागकर सीता, अपनी प्राणप्रिया ॥

हयमेध यज्ञ में समीप अपने
रघुकुल-प्रदीप ने
सहधर्मिणी के स्थान है स्थापित की
कनक-मूर्त्ति जानकी ॥

जननी ! दुर्लभ थी क्या
उनके लिये कोई प्रिया ?
कामना उन्होंने नहीं की
द्वितीया पत्नी की ॥

कहाँ गयीं माँ ! सती जनक-तनया ?
जीवित न होंगी क्या ?
इस विषय का ज्ञान हमें
प्राप्त हो न सका रामायण में ॥

माँ ! चलेंगे दोनों भ्राता हम
श्रीराम के कमल-चरण दर्शन करेंगे ।
कह रहे हैं मुनिसत्तम,
हमें संग ले चलेंगे ॥’

पुत्र-युगल के रसान्वित
वचनामृत-सिन्धु की ऊर्मियों ने उछल
कर दिया मज्जित
सीता के जीवन को उस पल ।
था सती का हृदय
जैसे तप्त-सिकतामय ।
प्लावित हो गया उधर
बरसा जब राम-प्रेम का जलधर ॥

मन-ही-मन कहने लगीं सती,
‘हाय ! मैं चिर-पापाचारिणी,
लिख रही थी भारती
प्रभु-हृदय की सन्ताप-कारिणी ॥

मैं तो अबला दुर्बल-हृदया अत्यन्त,
मेरे प्रभु का अनुग्रह अथाह अनन्त ।
प्रभो ! क्षमा-पारावार अगाध !
क्षमा कीजिये मेरा अपराध ।
विधि ने मुझे बना दिया इस पल
आपके हृदय का गरल ॥’

पत्र छुपा तदनन्तर
बोलीं जानकी हर्ष व्यक्त कर :
‘ जाओ प्यारे युगल नन्दन !
करने महाराज के पद-सरोज दर्शन ॥

कह रहे थे तात
वहीं तुम दोनों भ्रात
करोगे संगीत गान ।
स्वभाव से वह तो सुधा-समान ॥

पुण्यमय यज्ञ-क्षेत्र में
वह अमृत-प्रवाह बन
प्रत्येक हृदय-परिसर में
व्याप्त हो जाएगा सघन ॥

तुम्हें बुलाएंगे यदि रघुवंश-प्रदीप,
जाओगे उनके समीप
तुम युगल भ्रात,
करोगे चरणों में सभक्तिक प्रणिपात ॥

उधर देखोगे उनके अनुज-त्रय,
चरणों में उनके प्रणाम करोगे सविनय ।
तुम युगल सहोदर
राजमाताओं के पद-सरोज-रज पावन,
लगाकर मस्तक पर
सफल करोगे अपना जीवन ॥

उन तीनों के समीप आसीन
होंगी सीता की भगिनियाँ तीन ।
चरणों में उनके तुम युगल सहोदर
सीता-सी उन्हें मान प्रणाम करोगे सादर ॥

‘तुम दोनों किसके तनय ?’
यदि पूछेंगे कोई परिचय,
वहाँ दोगे उत्तर :
‘तपस्विनी-धन हम युगल सहोदर ॥’

इसप्रकार वचन से जननी के,
आनन्दित हो उठे नन्दन युगल ।
भर गया मन में उन्हींके
नवल कौतुहल ॥

न रहा भोजन शयन में आदर ;
उनके हृदय के भीतर
नृत्य करने लगी सर्वथा
श्रीराम की गौरव-गाथा ।
कथालाप कर राम-प्रसंग परस्पर
आ गये निद्रा की गोद में दोनों सहोदर ॥

जानकी का जीवन बहता रहा
पतिभक्ति-सरिता-धारा में प्रखर ।
आवर्त्त में भ्रमता रहा
वहाँ अस्थिर होकर ॥

उसे गोद में बिठाने
हुआ नहीं निद्रा का बल ।
इसलिये बताया उसने
योगमाया के समीप चल ॥

कहा : ‘देवीजी ! आज जीवन रामवधू का
मानवी हृदय-सीमा अतिक्रम कर चुका ।
बारह वर्षों तक
बरसाकर लोतक
भिगाकर अपनी शय्या
सीता जनक-तनया
धीरे से आती थी किसी भी प्रकार
मेरे अंक में एक बार ॥

मधुर वाणी में आज बारबार
कितना दे रही हूँ पुकार ।
परन्तु सती कुछ न श्रवण कर
स्वर्ग-राज्य की ओर है अग्रसर ॥

इस पल नेत्र-प्रतिमा पुत्र-युगल
हो जायेंगे उसकी आँखों से ओझल ।
उसके लिये दशों दिशायें सारी
हो जायेंगी अन्धकारभरी ।
सुख-सूर्योदय नहीं
उसके इस जीवन में कहीं ॥

पतिव्रता बनी मैथिली,
परन्तु उसे क्या सुफलता मिली ?
दुःखिनी देख सके अवश्य,
समुज्ज्वल कर दो उसका भविष्य ॥

प्राण-आलबाल में नयनों का पानी डाल
पाया अबला ने पतिभक्ति का उद्यान विशाल ।
वहीं न फूल खिला,
न कोई फल मिला ।
कहो तो उसका जीवन अपना
होगा घोर व्याकुल कितना ?’

योगमाया बोलीं : ‘चलो री सहचरी !
ढलने जा रही शीतल विभावरी ।
सीता के समीप जाकर
हम दोनों अभी सत्वर
उसका भविष्य-रहस्य
प्रकट कर देंगी अवश्य ॥’

तुरन्त निद्रा के संग योगमाया आयीं,
सीता की पर्णकुटी के अन्दर समायीं ।
दिव्य ज्योति से वनस्थल
उठा जगमगा ।
दिव्य सौरभ से महीतल
महकने लगा ॥

पाकर वही सौरभ मन्द-मन्द
जानकी के जीवन में भर गया पुलक ।
ज्योति-प्रभाव से हो गयी बन्द
उनके नयनों की पलक ॥

आया दृश्य यही,
ज्योतिर्मयी विराजी हैं जानकी ।
धरती है जगमगा रही
ज्योति से उनकी ॥

स्वयं मैथिली को साथ लेकर
रत्न-सिंहासन पर
विराजमान हैं प्रसन्न-वदन
ज्योतिर्मय श्रीरघुनन्दन ।
कुश बैठे हैं गोद में पिता की
और लव गोद में सीता की ।
समीप करके छत्र धारण
विद्यमान लक्ष्मण ऊर्मिला-रमण ॥

चन्द्रकिरण-सा शुभ्र सुन्दर चामर
चला रहे भरत स्वधर्म पालन कर ।
मयूर-चन्द्रिका-विरचित व्यजन
ले अपने हाथ झल रहे शत्रुघन ॥

भविष्य-मुख में सबकी जीवन-ज्योति प्रखर
बह रही सरिता का स्रोत बनकर ।
कोटि-कोटि नर नारी सभी मान
पुण्य तीर्थ महान्,
कर रहे हैं उस पावन
प्रवाह में अवगाहन ॥

सुदूर काल-समुद्र की ओर
चल रही जोर,
प्रतिक्षण अपना आकार
बढ़ाकर वही धार ॥

ऊपर से सभी अमर विद्याधर
बरसा रहे सुमन मनोहर ।
अमरों के संग दानव
नाग, अप्सरा, मानव
सबके ‘जय सीताराम’
उच्चार से व्याप्त हो गया धराधाम ॥

घर-घर में, प्राण-प्राण में, नगर-नगर में,
सरिता-नाव में, सागर-पोत में, कन्दर-कन्दर में,
दिन में, रात में,
प्रदोष में, प्रभात में,
सुख में, दुःख में,
धनी निर्धन सभीके हृदय में
‘जय सीताराम’
ध्वनि गूँज उठी है अविराम ।
मुग्ध हो गयीं निहार यही
सती-रमणी-कुल-शिरोमणि वैदेही ॥

* * * *


(तपस्विनी का एकादश सर्ग समाप्त)
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* स्वभावकवि-गंगाधर मेहेर-प्रणीत
ओड़िआ महाकाव्य ‘’तपस्विनी” का
डॉ. हरेकृष्ण मेहेर-कृत हिन्दी अनुवाद
सम्पूर्ण *

॥ श्रीः ॥
* * * * *



[ सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत "तपस्विनी".
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर.
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण २००० ख्रीष्टाब्द.]
* * * * *


‘तपस्विनी’ काव्य अष्टम सर्ग/ हरेकृष्ण मेहेर (Hindi Tapasvini Kavya Canto-8)

TAPASVINI
Original Oriya Epic Poem
By : Poet Gangadhara Meher (1862-1924)

Complete Hindi Translation by : Dr. Harekrishna Meher


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Tapasvini [Canto-8]
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[Canto-8 has been taken from pages 147-162 of my Hindi ‘Tapasvini’ Book
Published by : Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa, First Edition : 2000.]
For Introduction, please see : ‘ Tapasvini : Ek Parichaya '
Link :
http://hkmeher.blogspot.com/2008/07/tapasvini-ek-parichaya-harekrishna_27.html
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‘तपस्विनी’ महाकाव्य
मूल ओड़िआ रचना : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)
सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर

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अष्टम सर्ग
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यौवन जैसे बढ़ता जीवन में,
वसन्त वैसे बढ़कर ग्रीष्म बन गया वन में ।
युवा-बल जैसे होता प्रखर,
आतप वैसे हो चला प्रचण्डतर ।
किया उसने सुन्दरी मृगतृष्णा का सञ्चार,
सुख-विषय भोग तृष्णा जिस प्रकार ॥

त्याग शाल्मली-तरु-निवास
उड़ चला कार्पास,
कृपण का धन समयानुसार
उड़ता जैसे छोड़ गुप्त भण्डार ॥

पलाश-अंग में रहा नहीं पहले का रंग,
वैसे है क्षण-भंगुर संसार-प्रसंग ।
ताप से हुआ बहुतर
मल्ली का विकास,
फैलने लगा उधर
उसके अंग से अधिक सुवास ।
ताप से अटल रहता साधु-हृदय,
फैलता उसीसे शान्ति-यश अतिशय ॥

देखा मल्ली की ओर कुटज ने हर्षित-अन्तर,
साधु अवश्य रमता साधु-संग पाकर ।
विचार किया दोनों ने एक हृदय में :
‘महका करेंगे हम ग्रीष्म-समय में ।
वर्षा जब प्रदान करेगी जल
वसुन्धरा हो जायेगी शीतल ।
शान्ति लाभ करेंगे तभी
जीवजन्तु सभी ॥

कृपण नहीं कदम्ब और केतकी
करने सौरभ प्रदान,
करेंगे वे जगत की
तृप्ति का विधान ।
उन्हें सौंप लोक-रञ्जन का भार श्रम
तरु-दुनिया छोड़ चलेंगे हँसते-हँसते हम ॥’

उद्दण्ड पद्मिनी ने शीश उठा सानन्द-मन
कहा उन बातों का करके समर्थन :
‘तुम्हारे संग मैं रहूँगी,
काल-सागर की उत्तुंग तरंगों में कूद पड़ूँगी ॥’

मल्ली बोली : ‘अरी हाँ !
तू ऐसा कर सकेगी कहाँ ?
छोड़ेंगे नहीं तुझे पाकर
तेरे प्रियतम दिवाकर ॥’

बोली पद्मिनी : ‘ छाएगी जब घटा घनघोर
प्रियतम निहारेंगे नहीं मेरी ओर ।
विपत्ति में बिताकर कुछ दिवस
संसार-व्रत उद्यापन करूँगी बस ॥

मेरे प्रियतम
मेघ-पटल भेदने अक्षम ।
दुःख झेलते हैं ये
लोक-कल्याण के लिये ॥

प्रियतम का प्यार अनुराग भोग
कहाँ कर पाऊँगी अधिक दिन तक ?
नहीं मेरा सौभाग्य योग ।
करती रहूँगी अनुक्षण
उनके चरणों का स्मरण,
मुझे वरण कर ले जाएगा अन्तक ॥

इस जनम में कुछ दिन दुःख सहूँगी
तो अवश्य कर पाऊँगी
अगले जनम में दर्शन
प्रियतम का प्यारा वदन ॥’

यह वचन जब सीता के ज्ञान-श्रवण में पहुँचा,
मान उसे जीवन का आदर्श ऊँचा
बोलीं सती :
‘पद्मिनि ! तू साधवी है री !
तुझे अवश्य दीखती
सरणी पुण्यभरी ।
मेरे विचार में मैं तेरी भगिनी हूँ,
उसके ऊपर फिर भाग्य-भागिनी हूँ ॥

तेरी तरह पाया वन में पति का प्रणय,
भवन में सुख निर्मल अमृतमय ।
दिवस-नाथ सूरज हैं
तेरे प्रियतम स्वयम् ।
उनके वंशज हैं
पृथिवीनाथ मेरे प्रियतम ॥

कहती जो अपने भविष्य की अवस्था,
पहले से ही मुझे प्राप्त है वही पन्था ।
धन्य तेरा हृदय महान्,
तू सति ! धन्य धन्य है री !
कर ले प्रदान
मेरे जीवन में शुद्ध-मति तेरी ॥

लोकापवाद से दुःखित-मन
मेरे प्रियतम ने
मुझे त्याग दिया ।
बोल दिव्य-दर्शने !
पर-काल में स्वामी के दर्शन
भाग्य मेरा कर पाएगा क्या ?’

शीतल कमल-पंखुरियों के नीचे बस
घन-श्यामल-हृदय सरसी-जल में सरस
मध्याह्न चक्रवाक-दम्पति ने बिताया
और राजहंस ने संग ले अपनी जाया ॥

कारण्डव-कवल से बचकर झींगा
अम्बुज-वन में लम्बी छलांग लगा
छत्र-विशाल पत्र-वन में रास्ता भूल अपना
अन्त में बगुले का आहार बना ॥

उद्दण्ड अरविन्द-पंखुरियों के अन्दर
गिरी शफरी नीर में लम्फ दे रही ।
कुमुदिनी के बंकिम नाल पर
बैठने से पूर्व ही
फुदक रहा मण्डुक
डुण्डुभ के भय से दुकदुक ॥

आम्र-शाखा पर सविषाद बैठ कोयल
काक-नीड़ के पास
पत्रों में छुप विह्वल,
झेल सारी प्यास
पञ्चम स्वर में वहीं
श्रवणामृत बरसाती थी नहीं ।
छुप गयी थी जैसे
चाण्डाल के भय से ॥

अपनी पूँछ पसार
बुलबुल किसी प्रकार
पूँछ-छोर में रंगीन पर
नहीं नचा रही उधर ॥

पंख हिलाकर
देख अपना सोदर
वह थी क्रुद्ध नहीं होती,
पुकारती नहीं दे चुनौती ।
आहार ही उसे लड़वाता,

अन्यथा भ्राता किसका शत्रु बन जाता ?

पीन-अपघन
परिपूर्ण-उदर
बैठी थी वह प्रसन्न-मन
विशाल शाल-पादप-डाल पर ॥

बैठकर मधुक-जंगल में
मधुक फल काट भोजन-छल में
द्विज-स्वभाव से शुकगण
सूक्ष्म-पञ्जिकानुसार उसी समय
भावी वृष्टि-लक्षण
कर रहे थे निर्णय ॥

तमसा-तट पर वटवृक्ष-तल
गहन पत्र-छाया से था सुशीतल,
जहाँ कुटज-सुरभित कुटीर में अनायास
ग्रीष्म लेता शान्ति-चरणों में आश्वास ॥

वहाँ समासीन वाल्मीकि मुनिवर
खोल अपने ज्ञान-लोचन
दर्शन कर रहे पावन रामायण ।
कहीं कहीं तापसगण
रहे अध्ययन-तत्पर,
कहीं कोई वेद-गान में मगन ॥

गुरु गर्भ-भार से आलसी-काया
तापसी-समुदाय-परिवृत श्रीराम-जाया
घने कुञ्ज-वन में
बैठ पत्रासन
स्थिर नयन में
करतीं शान्ति सेवन ।
जैसे परिधि-मण्डित चन्द्र-मण्डली
पूर्णिमा की बिदाई पर अस्ताचल को चली ।
सती के पाण्डुर कपोल-परिसर के घर्म-पटल
शिशिर सदृश, हिम नेत्र-जल ॥

तापसियों के बीच रहकर श्रीराम-पत्नी
लंका-राक्षसी वृत्ति लाकर स्मृति में अपनी
कर रहीं भावना :
‘भाव तापसियों का कितना स्वर्गीय,
फिर राक्षसियों का भाव नारकीय
कुत्सित कितना ॥’

पवन-देव की दी बधाई,
जब मानस में आई
वीर पवन-कुमार की याद ।
सादर तालवृन्त व्यजन झल
देवी ने पाया सुशीतल
ऊर्मि का प्रसाद ॥

उसी समय समक्ष आ चिन्ता-सुन्दरी
बोली वाणी विनयभरी :
‘देवीजी ! कुछ लोग द्वार पधारे
प्यासे हैं दर्शन पाने तुम्हारे ।
यात्रा कर चुके राह बहुत लम्बी ।
धन्य वह दर्शन-कामना
प्रखर आतप से नहीं दबी ।
बन जाता हृदय अपना
अपार प्रीति का भण्डार
उनके कमनीय रूप निहार ॥’

बोलीं देवी : ‘सखी मेरी !
ले आओ उन्हें न कर देरी ।
भाग्य मेरा धन्य,
मुझ पर इतने आदर हैं अनन्य ।
अवश्य पाप-ताप मिटा देंगे मेरे नयन
पाकर उनके दर्शन ॥’

देवी की आज्ञा मान
पहले आकर
एक् ने मधुर मुस्कान
धीरे बिखराकर,
कई दिनों से परिचित बन्धु समान
कहा प्यारी बातों में अमृत सान ॥

‘देवीजी ! स्मृति में है क्या घटना पिछली ?
किया था पदार्पण
तुमने मेरे घर ।
पाई है मेरी काया ने उसी क्षण
तुम्हारी तनु-ज्योति से सुन्दर
यह स्वर्गीय प्रभा की सम्पदा उजली ॥

मेरे निर्झर उस प्रभा के व्याज
आनन्द-विभोर झर्झर बहते आज ।
प्रफुल्ल-वदन पुष्प-समुदाय हास्य निखार
नन्दन-कानन का करते तिरस्कार ॥

सरिता-सलिल महकाकर सदा सुगन्ध मन्द
तटवासियों के मन में जगाता आनन्द ।
तुम्हारे प्यार-पले मयूर सारे
उच्च स्वर नित्य गाते गुण तुम्हारे ॥

प्रतिक्षण वारिद आकर बारी-बारी से
अटल अभिलाषा रख तुम्हारे दर्शन की,
ढूँढते घूम-घूम दरी-दरी से
‘कहाँ है सुन्दरी जानकी ।’
पूछते मुझसे गंभीर स्वर में सभी,
‘नहीं है’ उत्तर से मानते नहीं कभी ।
ले उजाला बिजली का खोजते पुनर्वार
‘निश्चित है सीता सुन्दरी’ यही विचार ॥

देवीजी ! आज पहचाना क्या
इस हतभाग्य को तुमने ?
बहुत दिनों बाद आया
तुम्हारे सामने ।
तुम्हारी चरण-धूलि से सुन्दर
अपना मुकुट सजाकर
बन चुका हूँ भाग्यवान्
मैं चित्रकूट सानुमान् ॥’

तदुपरान्त पधारी एक शुभांगी रंगीली नयी
विमल-समुज्ज्वल-कान्तिमयी,
प्रखर-आतप-ताप-दर्पहारिणी,
वन-सुन्दरी की चिर-सहचारिणी ।
गिरिमल्लिका-माला से कण्ठ है सज्जित हुआ,
ललाट पर रमणीय शिरोमणि महुआ ।
जम्बु-नीलरत्न कर्णाभरण,
शुक्ति-पङ्क्ति जिसका कटि-भूषण ।
वनवासी मुनिजनों का अन्तःकरण मोहती,
सुन्दर कुटिल नील वेणी से सुहावनी लगती ॥

प्रफुल्ल प्रसन्न-वदन
उसने व्यक्त किया प्रत्यक्ष,
सुकुमार धीर मधुर वचन
सती के समक्ष :
‘अयि सुशीले !
कृतज्ञता मेरी स्वीकार ले सादर,
तेरे स्नेह-ऋण से ऋणी हूँ निरन्तर ।
ऋण कहाँ चुका पाऊंगी ? नहीं मेरी शक्ति,
मुझे कृतार्थ कर, सति !
आन्तरिक भक्ति मेरी ले ॥

दुनिया में मेरे जैसे हैं नहीं कितने ?
इतनी कृपा तेरी पाई है कहाँ किसने ?
पाकर तेरी शुभ दृष्टि पावनी,
मेरी बालुका है स्वर्ण-रेणु बनी ।
क्रीड़ा से रम गये जब दिव्य नयन तेरे
तूने हीरा-क्षेत्र बना दिया वक्षस्थल को मेरे । [१]
विद्यमान नगेन्द्र-नन्दिनी श्रीविष्णुपदी,
फिर भी तेरी प्रदत्त उपाधि से मैं हूँ ‘महानदी’ ॥’

आई निर्मल-कलेवरा गोदावरी
वदन में विषाद की छाया है भरी ।
अश्रु बहाकर व्याकुल-मन
पोँछ-पोँछ आँचल से सरोज-नयन,
समुज्ज्वल रंगों से रञ्जित कई
विचित्र चित्र अपने संग थी लाई ।
सती की अनुज्ञा लेकर शीघ्र ही
खोल स्तर-स्तर दिखाने लगी वही ॥

कहीं पुष्प-पुञ्ज झड़कर लतागण से
सड़ रहे मार्त्तण्ड की प्रचण्ड किरण से ।
शुष्क पत्र-शय्या पर पतित
कई वृक्ष हैं मलिन-वेश प्रभा-रहित ॥

एक टूटी शाखा किसकी
उस तरु का अंग छोड़ न सकी ।
तृणराशि की शरण चाहती चूम किसीका सिर,
किसीके पैर पकड़ फिर ॥

खग-पुरीषों से पूरित पत्र
शुक्ल कर रहे किसीका तन ।
ले ऊर्णनाभ-जाल रूप मलिन वस्त्र
आनन्द खो चुका कोई ढँक अपना आनन ॥

बक-विक्रम देख कई भेक बारबार
छलांग लगा झेल रहे क्लेश अपार ।
कुछ तो पाषाण-तल में छुपकर
चुपचाप बैठ भर रहे उदर ॥

कहीं वन्य महिष-दल अधीर
पंकिल कर रहे सरोवर का नीर ।
क्षिप्त हो रहे कर्दम से सने कुछ कमल
महिषों के पैरों से चञ्चल ॥

कहीं अजगर ले आहार-लालसा
नीर के पास पड़ा है काष्ठ-सा ।
उसके समीप मृगों का मार्ग निहार अनुकूल,
छुप-छुप अधर-प्रान्त लेहन करता शार्दूल ॥

फिर दृश्य हुआ प्रबल दावानल
धूमान्धकार से घिर वनस्थल ।
असंख्य-शाखावाली प्रचण्ड
अग्नि-शिखाएँ लिपटती
और खण्ड-खण्ड
गगन में जा रहीं मिलती ॥

ज्वलित पत्र सब अम्बर में उठकर
धूम-वाहन में चल रहे ।
दूर वृक्षों पर बैठ सुनाकर खबर
अतिशय ताप से जल रहे ॥

कुछ मुरझाये पत्र ऊर्ध्व मार्ग चल
अम्बर में हो रहे ओझल ।
पलायन-रत हैं विहंगम गगन में उड्डीन,
कुछ तो अग्नि-गर्भ में हो रहे विलीन ॥

मृग, महिष, मातंग,
शशक, शूकर,
भल्लुकों के संग
दल-दल शृगाल,
धूम-पुञ्ज से ग्रस्त होकर
अग्नि की ओर दृष्टि डाल
कान्दिशीक हैं समस्त
अत्यन्त विकल त्रस्त ॥

उधर अनेक वानर
भीत चकित-मन
छलांग लगा वृक्षों पर
कर रहे पलायन ॥

कुछ अपने शावकों को पीठ में रखकर,
कुछ अपने कक्ष में पकड़ जोर
दौड़ रहे धूम के भीतर
सरिता की ओर ।
सरिता के सैकत स्रोत से पुलिन पर्यन्त
भर गये हैं जन्तुकुल व्याकुल अत्यन्त ॥

बोली गोदावरी :
‘देखी तूने, वत्से जानकी !
तेरी बिदाई के बाद दशा दुःखभरी,
दण्डका-वन की ?’

बोलीं पर-दुःख-कातर सती :
‘हा हा ! दण्डका !
मेरे केलि-निधान !
लेकर जल मेरे नयन-युगल का
दैव तुरन्त करे तेरी शान्ति विधान,
तो मैं अपने को धन्य समझती ॥’

तदुपरान्त आ
मिलकर अयोध्या
सती के सामने
शोक-गद्गद दुःख-विकृत स्वन में,
कम्पित-अधर लज्जा-विनत वचन में
लगी राजलक्ष्मी का पत्र पाठ करने ॥

‘सखि ! मैं रजनी,
तू थी चाँदनी ।
मेरे प्रफुल्ल नयन-कुमुद मूँद
बिदाई तूने ले ली ।
तेरे बिना, अरी प्यारी !
और नहीं मेरे सुख की एक भी बूँद ।
बन गई है तेरी यह सहेली
जैसे आभरण-शून्या नारी ॥

आज राजभवन
बन गया है वन ।
तेरा विरह-दावानल उधर
सब नष्ट कर चुका समाकर भीतर ।
फिर बची है क्या
पूर्व सौन्दर्य-विलास-चर्या ?

जल चुके उल्लास-पल्लव-बहुल
विशाल साधु-हृदय-पादप-कुल ।
सुहास-सुरभित प्रसून समस्त
ओह ! अनायास वहाँ हो चुके विध्वस्त ॥

शान्ति-हरिणी-दल
साथ धीरज-गज सकल
विषाद-धूम से व्याकुल-जीवन
जाकर उदर में तितिक्षा-सरिता के
अपना अपना तन
आकण्ठ डुबा चुके ॥

खल-हृदय बलवान् श्वापद वहीं,
उस विपत्ति ने उन्हें भी छोड़ा नहीं ।
केवल श्रीरघुवर के
हृदय-सागर के
अथाह गर्भ में गहन,
वह बन गया है बड़वा-दहन ॥

जैसे राहु-कवलित कलेवर कलाकर का,
तेरे बिना बाकी है केवल आकार नरेश्वर का ।
मणिमय भवन में
छा गया है अन्धकार,
तारा-पूरित गगन में
अम्बुद जिस प्रकार ॥

बैठी हैं श्वश्रूगण विदीर्ण-हृदया
जैसे पुष्करिणी शुष्क-तोया ।
मणि जैसे सर्पिणी की प्राण-सम्पत्ति,
उससे अधिक तुझे वे मानतीं सम्प्रति ॥

बन्द हो चुके
द्वार प्रमद-वन के ।
किसकी दृष्टि में फिर आयेगी सुमन ?
पतित पुष्प-राशि को उधर
सुखा रहे मुस्तक समस्त उठकर
गन्ध-वणिक् बन ॥

शुष्क हो रहे लता-वृक्ष-निकर
तेरी स्मृति में दुःख-विह्वल मन ।
संगमर्मर-निर्मित मनोरम मार्ग पर
शुष्क पत्रों ने बनाये हैं आसन ॥

प्रभु की बात मान सभी देवर
विनत-शीश हैं विषादित-अन्तर ।
उरग जैसे मन्त्र से हीन-बल
या निशित अंकुश से शंकित दन्तावल ॥

भगिनियों के कपोल-परिसर
निर्भर कर रहे कर-सरोज पर ।
दिनों दिन तन उनके हो रहे कृश
कृष्णपक्ष के ऋक्षपति सदृश ॥

मृदंग-मुख छुए बिना संगीत-संगिनियाँ
बैठी हैं अपने आप गूंगी वहाँ ।
जी रही हैं व्यथा ले गहरी
बासी सुमन-सी दासियाँ तेरी ॥’

पत्र-पाठ -समाप्ति के पूर्व ही अयोध्या
बैठ गयी मलिन-रूपसी अधैर्या ।
दशा उसकी देखते ही
करुणामयी वैदेही
विवश हो गयीं अपने आप
पाकर अत्यन्त क्षोभ सन्ताप ॥

आ गया दिवस का अवसान अभी,
अपने निवास लौट चले अतिथि सभी ।
तापसियाँ सती को सप्रेम संग लेकर
हो गयीं अपने अपने कार्यों में तत्पर ॥
* * * * *


[पादटीका :
(१) सम्बलपुर के पास महानदी-गर्भ में ‘हीराकुद’ नाम का एक क्षुद्र द्वीप है । यहाँ हीरा मिलने की जनश्रुति है ।
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(तपस्विनी काव्य का अष्टम सर्ग समाप्त)
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[ सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत "तपस्विनी".
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर.
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण २००० ख्रीष्टाब्द.]
* * * * *

Sunday, November 20, 2011

‘तपस्विनी’ काव्य नवम सर्ग/ हरेकृष्ण मेहेर (Hindi Tapasvini Kavya, Canto-9)

TAPASVINI
Original Oriya Epic Poem
By : Poet Gangadhara Meher (1862-1924)

Complete Hindi Translation by : Dr. Harekrishna Meher

*
[Canto-9 has been taken from pages 163- 179 of my Hindi ‘Tapasvini’ Book
Published by : Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa, First Edition : 2000.]
For Introduction, please see :
‘ Tapasvini : Ek Parichaya' .
Link :
http://hkmeher.blogspot.com/2008/07/tapasvini-ek-parichaya-harekrishna_27.html

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Tapasvini [Canto-9]
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‘तपस्विनी’ महाकाव्य
मूल ओड़िआ रचना : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)
सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर

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नवम सर्ग
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सती का गर्भ-भार
धीरे-धीरे समयानुसार
हो चला गुरुतम
करके गुरुतर-भाव अतिक्रम ।
बैठ गयीं तो दुष्कर लगा उठना,
उठने से दुर्वह लगा शरीर अपना ॥

सती को इसी समय कष्ट होगा जान
वर्षा ने कर डाला ग्रीष्म का अवसान ।
श्रान्त प्राणों में शक्ति प्रदान करने
चतुर्दिशाओं में घिर उठे बादल घने ॥

ऊर्ध्व दिशा में सबने रोक सूर्यातप प्रबल
तान दिया अम्बर में चन्द्रातप श्यामल ।
चन्द्रातप-द्युति ने शम्पा-छटा से उसी क्षण
चकाचौंध कर दिये जनों के ईक्षण ॥

दिशांगनाओं ने नील वेणियाँ सँवार
खचित की बक-मोतीमाला उन पर ।
दिक्‌पालों ने सजा दिये सुन्दर बन्दनवार
रत्नाकर से रत्न-रेणु उठाकर ॥

पूर्व-दिगीश इन्द्र स्वार्थपर समुत्सुक
लज्जा त्याग बोले : ‘वह मेरा कार्मुक ।’
पश्चिम-दिक्‌पति रत्नाकर-अधीश्वर
बोले असहिष्णु होकर :
‘मेरे रत्नों से रचित वही
रहेगा मेरे समीप ही ॥’

अन्य दिक्‌पालों ने साधु धर्म मान
बारी का कर दिया समाधान,
उन दोनों के लिये पास अपने अपने
धनुष की स्थापना करने ॥

पुत्री-दुःख-सन्तप्ता रसा के सिर पर उस पल
वर्षा ने बरसाया जल सुशीतल ।
सरिता, सरोवर,
कानन, भूधर
सभी के सिर पर किया नीर सिञ्चन
स्वयं निष्पक्ष बन ॥

तृण-शस्यांकुर और कदम्ब-विकास रूपक
सञ्चरित हुआ धरित्री का पुलक ।
नीर से भरपूर
हो गया वसुधा का उर ॥

उभय तट उछल तमसा लगी चलने ;
सीता को आसन्न-प्रसवा निहार
मानो खुशियाँ लगीं उछलने
सभी के हृदय में अपार ॥

महीधर कानन सकल
छोड़ हृदय का अनल,
मलने लगे अपना अपना तन,
प्रफुल्ल हो उठे सारे वदन ॥

कण्टक-दुर्ग-वासिनी केतकी
होकर भी कण्टक-कलेवरा,
जैसे कहने लगी मधुर मुस्कान बिखरा :
‘ विपत्ति-विपिन में बँधी जानकी !
चिन्ता न करना अपने मन में ।
कण्टक-कानन में कण्टकिता मैं स्वयम्,
फिर भी वन्दिता हूँ सारे भुवन में
वितरण कर सौरभ मनोरम ॥

तापसी-वन में बनकर तपस्विनी धन्या
मनस्विनी ! तुम होगी विश्व-मान्या ।
लोगों की आँखें
जितना भी दूषण देखें,
वह क्या करेगा भला ?
अपना गुण जब दिव्यालंकार उजला ॥

कण्टक देखकर
यदि मधुकर
न दिखलाये मुझ पर अनुराग,
क्या सौरभ की स्पर्धा दूंगी त्याग ?‘

रमणीय कृष्णचूड़ा-पुष्प ने
प्रफुल्ल सौम्य वेश दिखला अपने
प्रलोभित किये सरस
दर्शकों के नयन मानस ॥

गजदन्त-पुष्प ने वसन्त समय से ठहर
वर्षा को दी सुमनों की खबर ।
कमल, मल्लिका और कुटज की कथा
उधर हुई अति प्रीतिदायिनी सर्वथा ॥

वर्षा ने उन्हें रत्न मानकर
किये बहुत यत्न प्रतिवासर ।
परन्तु कौन कर सकता अतिक्रम
विधाता का नियम ?

वर्षा कर न सकी
अपनी शक्ति से रक्षा उनकी ।
विनाश हुआ तीनों का
आया जब काल का झोंका ।
सती को चला पता यहीं,
आजीवन साधु उपेक्षित होता नहीं ॥

पुष्पालंकारों से सांवत्सरिक उत्सव मनाया
जूही लताओं ने मिलकर सकल ।
मानो सती का मानस बहलाने बनाया
वही सुगन्ध-महल ॥

अम्बुद-नीलाम्बरा श्रावणी विभावरी
हस्त-मस्तक में ले यूथिका रजनीगन्धा महकभरी,
सती-कुटीर के प्रांगण में खड़ी होकर
व्यथा मिटाने थी उजागर ॥

जानकी का प्रसव-लक्षण
प्रकाशित होने लगा आ प्रतिक्षण ।
सती का क्लेश लेकर
अदूर में अत्यन्त आर्त्त स्वर
दर्दूर सब रो पड़े
विकल हो बड़े ॥

चातक ने लेकर सती की तृषा
अम्बर में बारम्बार की वारिद से वारि-भिक्षा ।
वृद्धा तापसियाँ सती के समीप रहकर
समयोचित विधान में हुई थीं तत्पर ॥

निशा में निशामणि-कान्ति-हारक
सम्भूत हुए सती के यमज बालक ।
कुमारों की ज्योति ने मिल सौदामिनी के संग
दश दिशाओं में बिखरा दी आलोक-तरंग ॥

तोप गर्जन किया सानन्द पुरन्दर ने ;
न जाननेवाले लगे उसे ‘वज्र’ कहने ।
दिशांगनाओं की हुलहुलि-ध्वनि सहित
मिल गया मस्ती से मेघों का स्तनित ॥


सारे पर्वत कानन
बरसाने लगे सुमन ।
केदार, नदी, सरोवर
सब हो गये नृत्य-तत्पर ॥

कुमारों के दर्शनाभिलाषी घन
उतर आये नीचे धारा-रूप बन ।
पुलिनों के ऊपर उछल
चलने लगीं चञ्चल
सारी सरिताएँ उत्कण्ठित-मानसा
हृदय में भर दर्शन की लालसा ॥

मत्स्यगण त्याग सागर का अंग
लगे नृत्य करने तरंगिणी संग ।
झील-सरोवर-क्षेत्रों के अन्दर
उठ सलिल के ऊपर
सानन्द-मन कई मीन
हुए नृत्य में तल्लीन ॥

दर्शनेच्छुक ‘केउँ’ मछली
अतिशय उछलकर
सबके आगे चली
चढ़ ताल-तरु के शिखर ॥

महर्षि वाल्मीकि ने सत्वर पधार
सन्दर्शन किये युगल कुमार ।
सोचा उन्होंने साग्रह,
‘वृहस्पति शुक्र दोनों ग्रह
एक साथ चल
आश्रम-अम्बर में आये निकल ॥’

महर्षि का प्रभात-सा हृदय
आनन्द-पुष्पों से हो गया सौरभमय ।
कुश-गुच्छ लिये
हाथ में अपने,
अग्र पश्चात् द्विखण्ड किये
मन्त्रोच्चार सहित मुनिवर ने ॥

अनुकम्पा के हाथ सौंप बोले तपोधन :
‘देवी ! करो कुमारों का सम्मार्जन ।
कलेवर मार्जन करो अग्र खण्ड से अग्रज का
और निम्न खण्ड से अनुज का ॥’

अनुकम्पा ने किया सम्पन्न
जानकी-तनुजों का सम्मार्जन
मुनीश्वर के आदेश अनुसार,
भूतनाशिनी रक्षा उसी प्रकार ॥

कुश-लव के प्रयोग से सम्मार्जित अंग युगल (१)
शाणित रत्नों से भी हुए अधिक समुज्ज्वल,
जैसे तृण-युक्त वैश्वानर,
या सागर-तरंग-मुक्त नवल दिवाकर ॥

जब वैदेही लगीं निहारने
कुमारों के युगल आनन,
हुआ हृदय में अपने
सुख-दुःख का एक साथ आगमन ॥

सुख बोला : ‘गर्भ में अपने
धारण किये थे जिसने
सूर्य-चन्द्रोपम युगल कुमार,
धन्य वही जननी, धन्य शत बार ।
इससे अधिक सौभाग्य कहीं
संसार में दूसरा नहीं ॥’

दुःख बोला : ‘आज दोनों राजकुँवर
मणिमय भवन में लगते कितने सुन्दर ।
नरेन्द्र-हृदय में अपार आनन्द जगाते,
दीन दुःखियों की दरिद्रता दूर भगाते ॥

प्राप्त करते आज नगरवासीगण
कितने धन रत्न वस्त्र आभरण ।
मंगल नादों से भरा होता नगर,
मंगल वाद्यों से गूँज रहा होता अम्बर ।
ओह ! भाग्य-दोष से बन तापस-तनय
तापसों के आश्रम में लिया आश्रय ॥’

सती-नयनों से लेकर
सलिल दो धार,
दुःख चला गया सत्वर
देकर पुत्रों का प्यार ॥

निहार कुमारों के रूप उभय,
शुद्ध सुखमय हो गया सती का हृदय ।
उनका मन तभी
लगा नहीं तनिक-भी
चलाने अपने नेत्र
पुत्रों को छोड़ अन्यत्र ॥

मातृ-नेत्रज-स्नेह-समुज्ज्वल रंग
कुमारों के युगल अंग
रंगकर बारबार,
लाया उन नयनों में प्रतीति इस प्रकार,
मानो हैं उदीयमान
नवल हिमांशु और अंशुमान् ।
मानस में कर सिंहासन की स्थापना
दरशाया आनन्द ने सार्वभौमत्व अपना ॥

सहर्ष अनुकम्पा ने किया सम्पादन
शीघ्र कुमारों का नाभिच्छेदन ।
तदुपरान्त ले मन्त्र-पूत जल
अवगाहन कराके निभाये विधान सकल ॥

करने लगीं कोलाहल
निहार कुमार युगल
तापसियाँ आनन्द-गद्गद स्वर ।
रहे मुनिपुत्रगण पङ्क्तिबद्ध नृत्य-तत्पर
साथ-साथ करके संकीर्त्तन
श्रीराम-नाम पावन ॥

दुर्धर्ष दुर्जन लवणासुर का करने निधन,
वीरवर शत्रुघन
रहे थे प्रस्थान-पथ पर उसी रात
पावन वाल्मीकि-आश्रम में दैवात् ॥

आश्रम के उस आनन्द-नाद में
रमकर रिपुसूदन
स्वयं आनन्द-नद में
हो गये मगन ॥

अत्यन्त प्रफुल्ल-अन्तर
उन्होंने प्रशंसा कर
जानकी से कहा :
‘मातः ! आप हैं रघुवंश में पावनी,
सर्वंसहा आपकी जननी ।
इसी कारण आप भी स्वयं सर्वंसहा ॥

वसुमती-नन्दिनि ! आपने
वसु रखा था गर्भ में अपने ।
हमारा सौभाग्य महान् ।
किया रघुकुल को आज जो वसु प्रदान,
विराजेगा वह विभास्वर
अयोध्या-राजलक्ष्मी के मस्तक पर ॥’

मुनिकुमारों के आनन्द-कोलहल में उधर
सम्मिलित हो गये सारे विहंग,
दल-बद्ध होकर
कुरंगों के संग ॥

एक पल-सी बीत गयी विभावरी
श्रावणी वर्षिणी भयंकरी ।
लवण के प्रति सुमित्रा-पुत्र हुए अग्रसर
मुनि-चरणों में नमन पूर्वक सादर ॥

तापस-तापसियों को द्रव्य से करने प्रसन्न
लगा स्वभाव से सती का मन ।
परन्तु सती का वहाँ
इच्छानुरूप धन कहाँ ?
उन्होंने तो स्वयम्
आश्रय कर लिया है वनाश्रम ॥

चाहती चाँदनी विश्वभर
तृप्ति प्रदान करने,
परन्तु हाय ! गगन पर
छा गये बादल घने ॥

जब आईं जानकी
अपने भवन से,
मन में भावना थी उनकी
शीघ्र लौट चलेंगी वन से ।
मुनिकन्याओं के लिये लायी थीं उपायन
कुछ आभूषण और वसन ।
तापस-तापसियों के मन में सन्तोष लायीं सीता
उन्हें बाँटकर लज्जावश विनीता ॥

उन सबका हृदय-पारावार
करने लगा विस्तार
परम प्रसन्नता की लहर,
उन्हें चन्द्रकिरण-जैसे पाकर ॥

थे सती ने सञ्चित किये
जितने फल और नीवार,
सब बण्टन कर दिये
खग-मृगों को आहार ॥

खींचतान कर परस्पर
भक्षण किया सबने ।
चञ्चू से पकड़ तत्पर
कुछ विहंग लगे उड़ने ॥

सारिका-शावक नीड़ में अपने
बैठे थे खोल वदन,
सस्नेह उन्हें उनकी माता ने
कर दिया आहार बण्टन ॥

सहर्षनाद मयूरियों के संग मोर
हो गये वृक्षों पर अत्यन्त नृत्य-विभोर ।
कोकिल ने घूम द्वीप-द्वीपान्तर
प्रचार कर दी वह शुभ खबर ॥

कैलास को देने वही मंगल समाचार
चला राजहंस आनन्द-नाद पसार ।
रखा था गौरी को दिलाने विश्वास
मृणाल-किसलय का पत्र अपने पास ॥

समाचार से हृदय में भर उल्लास अत्यन्त,
शिवजी से करके निवेदन,
छोड़ अपना कैलास-सदन
सती के हाथों पूजा-प्राप्ति की अभिलाषिणी
गौरी षष्ठीदेवी-रूपिणी,
अम्बर में कादम्बिनी के संग विराज
जलद-ज्योति के व्याज,
पहुँच गयीं वाल्मीकि-आश्रम पर तुरन्त ॥

सप्त तापस-कन्याओं के कलेवर में
विराज सप्त-मातृका समान,
वर-भुजा गौरी ने षष्ठ वासर में
सती-हस्त की अर्चना स्वीकार सादर
समस्त अरिष्ट विनष्ट कर,
यमज पुत्रों को किया सिंह-बल प्रदान ॥

हुआ क्रम से दिवस उपनीत
नामकरण का अवसर पुनीत ।
कुमारों के नाम श्रवण के प्यासे
स्वर्गपुर त्याग उधर पधारे देवगण ।
देवियों ने उस उत्सुकता से
किया दलबद्ध होकर उनका अनुसरण ॥

शरत् काल के शुभागमन हेतु उधर
मार्ग छोड़ रहा था अम्बर में अम्बुधर ।
उस मार्ग पर सब रवि-तेज के सहित
अनायास चले ज्योतिर्मय स्यन्दन में विराजित ॥

आश्रम में पहुँच तब
सुमन-समूह में महक बन
अत्यन्त मन-मोहन,
बस गये सब
स्वर्गीय सुन्दरता बिखराकर
विकास के बहाने मुस्कुराकर ।
तापस-तापसियों के हृदय के भीतर
कुछ समा गये आनन्दमय होकर ॥

पाकर महर्षि वाल्मीकि का निदेश
द्विगुण आनन्दित-मन
तापस-तापसियों ने सत्वर
उपवन में करके प्रवेश,
लाकर कई नव पल्लव सुमन
की मण्डप रचना मनोहर ॥

निशीथिनी के प्रथम प्रहर में उधर
लगा अतिशय सुन्दर
आश्रम चित्ताकर्षक,
प्रज्वलित प्रदीप-मालाओं से ।
प्रचुर ऐंगुद तैल समस्त दीपक
लूट रहे थे तापसों के हाथों से ॥

चहुँदिशाओं में कुसुमित तरु-वल्लरियाँ
खिलखिला रही थीं पाकर रश्मि की ऊर्मियाँ ।
था वही समय सुमनों का त्योहार
चक्रवर्त्तिनी का बढ़ रहा था गर्व-भार ॥

समुद्रों में जैसे क्षीर-पारावार,
वृन्दारकों में पुरन्दर जिस प्रकार,
जैसे हिमगिरि के तुंग शृंगों में गौरीशंकर,
वैसे वाल्मीकि तपस्वी महान्
विराजे मुनियों में शोभायमान
मण्डप में आसन बिछाकर ॥

संग लेतीं युगल अश्विनीकुमार
छाया और संज्ञा जिस प्रकार,
वैसे कर-कमलों से थाम
यमज कुमार अभिराम
पधारीं मण्डप में सती और अनुकम्पा ।
आविर्भूत हुई शोभा वहीं सदर्पा ॥

कृष्ण-त्रयोदशी-शशी के पास निकली
भा रही नभ में
प्रभाती तारका ।
मानो खड़ी है प्राची मतवाली,
सरोवर-गर्भ में
धारण कर प्रतिबिम्ब उनका ॥

सीता की सहचरियाँ
प्रसन्न-मुख सरल-हृदया तापस-कुमारियाँ
सती-प्रदत्त वसनों से सुशोभना,
आवृत कर कलेवर अपना अपना
अतिशय प्रमुदित-अन्तर
बैठ गयीं सती के समीप उधर ।
प्राप्त कर उषा-प्रदत्त नयी किरण उज्ज्वल,
जैसे उषा के पास सरोजिनी सकल ॥

देवार्चना हुई सम्पन्न
वैदिक विधि के अनुसार,
हुआ मंगल शंख-स्वन
और तूर्यनाद का विस्तार ॥

ज्येष्ठ पुत्र को शुभाशीष देकर
बोले प्रसन्न-मन मुनिकुल-शेखर :
‘कुशाग्र-मार्जित इसका नाम होगा ‘कुश’,
बनेगा बैरी-वारणेन्द्र-गण का अंकुश ।’
महामनीषी मुनीश ने उसी प्रकार अभिनव
कनिष्ठ पुत्र का नाम रखा ‘लव’ ॥

राम-नाम उच्चारण किया मुनियों ने
बजाकर संग-संग
मन्दिरा, खञ्जनी और मृदंग ।
तापस-नन्दिनियों ने
वीणा बजाकर मांगलिक
गाये गीत सुधा से भी मधुर अधिक ॥

सुरभि-रूप धारण कर
समस्त अमरी अमर
हो गये वहाँ नृत्य-मगन
अपार आनन्दित-मन ।
चतुर्दिशाओं में स्थित मृग-मृगीगण
निहार रहे विस्मितेक्षण ॥

आश्रम के आनन्द-कोलाहल में वनभूमी ने
योगदान किया प्रतिध्वनि के बहाने ।
वल्ली पादप सभी मानो संगीत-तत्पर
हो गये विद्याधर-विद्याधरियों का गर्व अपनाकर ॥

आनन्द से जगमगा उठा आश्रम,
परन्तु सती के वदन-कुमुद में तम
राम-चन्द्र ही के बिना छा गया ।
उनका पर्व तो था अमावस्या ।
अन्धकार ने बढ़ाया गौरव उन्हींका,
अन्धकार के कारण ही आदर है चाँदनी का ॥

सती के नन्दन-रत्नद्वय सुन्दर
हुए उधर दृश्यमान,
रत्न-सानु के गभीर कन्दर
जैसे शोभायमान ॥

ऋषि-देवों ने मिल मनाकर आनन्द त्योहार
किया सती का गौरव विस्तार ।
स्वाभाविक रीति यह महाजन की,
सुपात्र को सम्मान देने में प्रीति उनकी ॥

अन्त में कुमारों के प्रति
कल्याण-कामना के बाद
प्रदान किया महामति
मुनिवर ने शुभाशीर्वाद ॥

तापसों के हृदय-कमल में आसन बसाकर
‘तथास्तु’ उच्चारने लगे समस्त अमर ।
गंभीर नाद में वन-पादप-लतिका सकल
‘तथास्तु’ कहने लगे आनन्द-विह्वल ।
‘तथास्तु’ उच्चारने लगे सुस्वर
दिशा-विदिशाओं से सारे दिगीश्वर ॥


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[पादटीका :
(१) कुश = द्वि-खण्डित कुशगुच्छ का अग्र खण्ड ।
लव = द्वि-खण्डित कुशगुच्छ का निम्न खण्ड । ]

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(तपस्विनी काव्य का नवम सर्ग समाप्त)
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[ सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत "तपस्विनी".
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर.
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण २००० ख्रीष्टाब्द.]
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Sunday, November 13, 2011

Poet Gańgādhara Meher's Tapasvinī Kāvya : A Glimpse/ HKMeher

Poet Gańgādhara Meher's Tapasvinī Kāvya : A Glimpse
(From the Pen of Dr. Harekrishna Meher)

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(Poet Gańgādhara Meher)




Gańgādhara Meher, popularly known as ‘Swabhāva-Kavi’ is one of the illustrious makers of Indian literature. In the galaxy of poets of Oriya literature, he is a scintillating star of first magnitude. Coming on 9 August 1862, Śrāvaņa Pūrņimā (Rākshī Bandhan), the day of full illumination, at Barpali in the then Sambalpur district of Orissa, his mortal form disappeared in the murky veil of Chaitra Amāvāsyā on 4 April 1924.

Literary compositions of Gańgādhara Meher comprise several kāvyas, essays, autobiography and numerous lyrics : devotional, patriotic, satirical and reformative. His main works are Tapasvinī, Pranaya-Vallarī, Kichaka-Vadha, Indumatī, Utkala-Lakshmī, Ayodhyā-Druśya, Kavitā-Kalloļa, Arghya-Thāļī, Ahalyā-Stava, Mahimā, Bhāratī-Bhāvanā, Kavitāmāļā, Padminī and Krushaka-Sańgīta. “Gańgādhara Granthāvalī”, the compilation of all his writings, has earned high appreciations through several publications.Like Kālidāsa in Sanskrit and William Wordsworth in English, Gańgādhara Meher is regarded as ‘Prakriti-Kavi’, Poet of Nature, in Oriya literature. He sees and shows the entire universe ever-beautiful, nectareous and imbued with ambrosia.

'Tapasvinī’, an eleven-canto Oriya epic poem, is the magnum opus and a great classic of this illustrious poet. With the prevailing sentiment of Pathos, this kāvya depicts the post-banishment episode of Sītā in the hermitage of Sage Vālmīki. In this Rāmāyaņa-based literary composition, the poetic presentation is well- embellished with originality and significant innovations.

Sītā, the daughter of Earth and the devoted wife of King Rāma, in her later life appears as a ‘Tapasvinī’, A Woman practising penance or An Ascetic- maid, in the pen of Gańgādhara Meher. This epic poem reveals the ambition of the poet to portray the brilliant character of a devoted wife steeped in Indian culture in the domain of literature. With vivid and prominent delineation of Sītā’s life-deeds, Tapasvinī kāvya may be construed as a ‘Sītāyana’ in the field of Indian Literature.
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For wide popularization and comparative correspondence, I have completely translated ‘Tapasvinī’ into English, Hindi and Sanskrit.*From among these tri-lingual translations, Hindi Rendering Book "TAPASVINI" has been published by Sambalpur University, Jyoti Vihar, Burla, Orissa, in 2000.
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My English Book entitled "TAPASVINI OF GANGADHARA MEHER" (Complete English Translation, ISBN : 81-87661-63-1. First Edition : 2009, Pages- 220) has been published by : R.N. Bhattacharya (Book Publishers & Exporters), A-217, H.B. Town, Road No.4, Sodepur, Kolkata- 700110, India.
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Tapasvini : Ref: (International Circulation) :
http://hkmeher.blogspot.com/2010/06/ref-to-english-book-tapasvini-of.html http://hkmeher.blogspot.com/2009/08/english-version-book-of-oriya-tapasvini.html
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References of ‘Tapasvini’ can be seen on these sites :
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Original Oriya :
(Tapasvini, Canto-IV, ‘Mańgaļe Ailā Ushā’) मङ्गळे अ‍इला उषा : http://hkmeher.blogspot.com/2007/08/oriya-kavya-tapasvini-of-swabhava-kavi.html
*
English Translation :
(‘Auspiciously came Ushā’ ) :
http://hkmeher.blogspot.com/2007/07/tapasvini-canto-iv.html
*
Hindi Translation :
(‘Samańgal Āī Sundarī Praphulla-Nīraj-Nayanā Ushā’ )
समंगल आई सुन्दरी प्रफुल्ल-नीरज-नयना उषा :
http://hkmeher.blogspot.com/2007/07/hindi-version-of-tapasvini-kavya.html
*
Sanskrit Translation :
(‘Mańgalam Samāgatā Saumyāńganā Ushā Vyākoshāravinda-Locanā’ )
मङ्गलं समागता सौम्याङ्गना उषा व्याकोषारविन्द-लोचना :
http://hkmeher.blogspot.com/2007/07/sanskrit-version-of-tapasvini-kavya.html
*
Sanskrit Article (संस्कृत-तपस्विनी-काव्यम् : एकमालोकनम्) : http://hkmeher.blogspot.com/2011/07/gangadhara-mehers-tapasvini-sanskrit.html
*
Research Article (‘Tapasvinī of Gańgādhara Meher : A Critical Observation') :
http://hkmeher.blogspot.com/2007/08/tapasvini-of-gangadhara-meher-critical.html
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/10/english-tapasvini-kavya-tapasvini.html
*
Blog Reaction : ‘Musepaper’ : ‘Poet Gańgādhara is influenced by Bhavabhūti’ :
http://themusepaper.blogspot.com/2008/07/poet-gangdhara-is-influenced-by.html
*
PoemHunter :
(Auspicious Dawn): http://www.poemhunter.com/poem/auspicious-dawn/
(Duty of a King) : http://www.poemhunter.com/poem/duty-of-a-king/
Conjugal Love of Sītā and Rāma :
http://www.poemhunter.com/poem/conjugal-love-of-sita-and-rama/
http://hkmeher.blogspot.com/2008/05/tapasvini-kavya-conjugal-love-of-sita.html
*

River Tamasā (Poet’s Philosophy of Life) :
http://hkmeher.blogspot.com/2008/07/river-tamasa-tapasvini-poets-philosophy.html
*
Rāma’s Coronation in the Vision of Sītā :
http://www.poemhunter.com/poem/rama-s-coronation-in-the-vision-of-sita/ *
http://hkmeher.blogspot.com/2009/07/ramas-coronation-in-vision-of-sita.html
*
'Muse India' (Literary e-journal in English) Issue 21 / Sept.- Oct. 2008
(Extracts from English Translations of Tapasvini) :
http://museindia.com/viewarticle.asp?myr=2008&issid=21&id=1258
*
On My English Book "Tapasvini of Gangadhara Meher", Literary Appreciation
by Dr. Mahendra Kumar Mishra ('Muse India' Issue- 37, May-June 2011.

Ref : http://www.museindia.com/focuscontent.asp?issid=34&id=2292
*
'Srijangatha' (e-magazine in Hindi) /Gangadhar Meher Ki Do Kavitaayen :
सृजनगाथा / गंगाधर मेहेर की दो कवितायें :

http://www.srijangatha.com/?pagename=Bhashantar2_May2K9
*
Srijanagaathaa / स्वभावकवि गङ्गाधर मेहेर : एक अमर प्रतिभा : http://www.srijangatha.com/?pagename=Hastakshar_Jun2k9
*
Tapasvinī : Ek Parichaya ( Article Taken from My Hindi ‘ Tapasvinī ’ Book ) : http://hkmeher.blogspot.com/2008/07/tapasvini-ek-parichaya-harekrishna_27.html
*
The Ambrosial ['Amrutamaya' : Mu Ta Amruta-Sāgara-Bindu.] http://hkmeher.blogspot.com/2008/08/ambrosial-amrutamaya-of-gangadhara.html
*
Kaavyaalaya : http://www.manaskriti.com/kaavyaalaya/amritmay.stm
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Complete English ‘TAPASVINI’ Kavya :
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/10/complete-english-tapasvini.html
http://hkmeher.blogspot.com/2011/10/tapasvini-kavya-complete-english.html
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Complete Hindi Tapasvinī Kāvya :
http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/complete-hindi-tapasvini-kavya.html
*
Articles on My Hindi-English-Sanskrit Translations of Tapasvinī Kāvya :
http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/my-hindi-english-sanskrit-articles-on.html
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/08/blog-post.html
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Monday, October 31, 2011

English Tapasvinī Kāvya (Tapasvini : A Critical Observation/Harekrishna Meher)


TAPASVINĪ
Original Oriya Epic Poem By : Poet Gańgādhara Meher (1862-1924)
Complete English Translation By : Dr. Harekrishna Meher
*
‘Tapasvinī of Gańgādhara Meher : A Critical Observation’
This Research Article has been taken from pages xiii- xl of my English Book
‘ Tapasvinī of Gańgādhara Meher ’

Published by : R.N. Bhattacharya, A-217, Road No.4, HB Town, Sodepur,
Kolkata-700110, India. First Edition : 2009, Total pages : xl +180 =220.
ISBN : 81-87661-63-1]
All Rights Reserved by the Author.


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‘Tapasvinī of Gańgādhara Meher : A Critical Observation’
Article by : Dr. Harekrishna Meher
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[The Sītā-Rāma-story of India has an indelible impression on the people of both oriental and occidental cultures. Sītā, the adorable daughter of Earth and the devoted wife of King Rāma, in her later life appears as a Tapasvinī, A Woman practicing penance or An Ascetic-maid, in the pen of Poet Gańgādhara Meher.

Tapasvinī, an eleven-canto Oriya epic poem, is the magnum opus of this great poet. With the prevailing sentiment of Pathos, this kāvya depicts the post-banishment episode of Sītā in the hermitage of Sage Vālmīki. In this Rāmāyaņa-based literary composition, the poetic presentation is well-embellished with originality and significant innovations. Like Kālidāsa in Sanskrit and William Wordsworth in English, Gańgādhara Meher is regarded as ‘Prakŗti-Kavi’, Poet of Nature, in Oriya literature.

This epic poem reveals the ambition of the poet to portray the brilliant character of a devoted wife steeped in Indian culture in the domain of literature. With vivid and prominent delineation of Sītā’s life-deeds, Tapasvinī kāvya may be construed as a ‘Sītāyana’ in the field of Indian Literature.

In the present article, endeavours have been made to elucidate the significance of Tapasvinī, and some salient features of this literary work are being discussed here in a comparative perspective.]


INTRODUCTION :

Gańgādhara Meher, popularly known as ‘Svabhāva-Kavi’ is one of the illustrious makers of Indian literature. In the galaxy of poets of Oriya literature, he is a scintillating star of first magnitude. On 9 August 1862, he was born at Barpali, a small town in the then Sambalpur district. Hailing from a family weaving Sambalpuri sarees, though he had little education in school, he possessed a great poetic talent that presented a novel sensibility in the literary arena. Coming on Śrāvaņa Pūrņimā (Rākshī Bandhan), the day of full illumination, his mortal form disappeared in the murky veil of Chaitra Amāvāsyā on 4 April 1924. Gangadhar Meher College of Sambalpur, one of the distinguished Government colleges of Orissa has been named after him in memory of his poetic genius.

Literary compositions of Gańgādhara comprise several kāvyas, essays, autobiography and numerous lyrics : devotional, patriotic, satirical and reformative. His main works are Tapasvinī, Praṇaya-Vallarī, Kichaka-Vadha, Indumatī, Utkala-Lakshmī, Ayodhyā-Dŗśya, Kavitā-Kalloļa, Arghya-Thāļī, Ahalyā-Stava, Mahimā, Bhāratī-Bhāvanā, Kavitāmāļā, Padminī and Kŗshaka-Sańgīta. “Gańgādhara Granthāvalī”, the compilation of all his writings, has earned high appreciations through several publications. Many research works have been done on his literary writings and various aspects of his life. Ideals of Indian culture are mainly reflected in his poems. His poetic originality uniquely attracts the minds of connoisseurs in the literary sphere. He sees and shows the entire universe ever-beautiful, nectared and imbued with ambrosia.

‘Tapasvinī’ is regarded as the best creation of Gańgādhara. For wide popularization and comparative correspondence, the author of the present article has completely translated ‘Tapasvinī’ into Hindi, English and Sanskrit. From among those tri-lingual translations, Sambalpur University, Jyoti Vihar, Burla, Orissa, has published the Hindi Rendering in 2000. The passages of Tapasvinī quoted in this article have been taken from his English Rendering. Previously several passages with discussions have been published in Bartikā (1), Kāntāraka
(2), Saptarshi (3), Jhańkār (4) and Suntimes (5).

GENESIS OF TAPASVINĪ :

Rāmāyaņa of Vālmīki and Mahābhārata of Vyāsa, the two great epics of Sanskrit literature, have profoundly inspired many poets, playwrights, thinkers, critics and litterateurs of various languages in India and abroad. Indian life has been so permeated with these epics that it can never avoid them. Cultured with Sanskrit, worthy sons of Indian soil have contributed much to make the literatures of Indian languages prosper in various ways.The Sītā-Rāma-story of India has immensely influenced the people of both oriental and occidental cultures. In Oriya literature, Sītā, the dearest daughter of Earth, in the later part of her life, appears as a Tapasvinī in the poetic vision of Gańgādhara.

Tapasvinī, an eleven-canto Oriya epic poem, is a great classic of Gańgādhara Meher, who is renowned as Prakŗti-Kavi in Oriya literature. The main theme of this kāvya is the post-banishment episode of Sītā in the hermitage of Sage Vālmīki. Dealing with a topic of poignant Pathos, this kāvya is basically influenced by Uttara-Kāņđa of Vālmīki’s Rāmāyaņa, Raghuvamśa mahākāvya of Kālidāsa and Uttara-Rāma-Charita drama of Bhavabhūti, still the poetic presentation is marked with originality and significant innovations. One can freely observe the novelty of the poetic genius after going through the matters described in different cantos.

‘Tapasvinī’ literally means ‘A woman observing penance’ or ‘An ascetic-maid’. The word ‘Tapasvinī’ used by Gańgādhara has been most probably taken from the verses of Kālidāsa. As the context in Raghuvamśa goes on, Sītā, being banished by King Rāma and deserted by Lakshmaņa, gives message to her life-lord. There Sītā says : “After delivery of child, I shall try my best to practise penance having fixed my eyes on Sun, so that in the next birth, you again will be my husband and there will be no separation.”(6) Again as she says, Rāma is the monarch of the world which includes even the forest-regions. Now she is one of the subjects of the forest-sites. She solicits that as a common hermitess or ascetic-maid, though banished, she should kindly be supervised by his kingship in accordance with the royal duty enumerated by Manu.(7) Further, as Kālidāsa writes, Sītā having ‘Valkala’ (bark-skin of tree) dress for penance abides in the hermitage and bears her mortal body to give heir to her husband.(8)

In the verses of Kālidāsa, ‘Tapas’ (penance) is clearly meant for Sītā in the later part of her life. Gańgādhara happens to take the word ‘Tapasvi’ from Kālidāsa and has used it as ‘Tapasvinī’ in feminine gender for Sītā. Moreover, the poet in the Preface of Tapasvinī kāvya mentions : “The main purpose of this book is to elucidate how Sītā strengthened and heightened more and more, her devotion-to-husband (pati-bhakti) by deeming exile as her own misfortune and how she as a ‘Tapasvinī’ spent time by rendering her forest-dwelling into penitential austerity beneficial to her husband.”(9) The poet further expresses his hope that the wise readers would once unveil the memory’s curtain portrayed with the brilliant impeccable and sacred character of Sītā of their own hearts and would render uplift of the hearts of women.(10)

Gańgādhara is very distinct and doubtless in his writing. Sītā is the heroine of this epic poem that analyses the social condition of a married woman and contends to give appropriate honour and status even after separation from her husband. Tapasvinī mainly treats of the plight of Sītā’s later life, yet the entire story of Rāmāyaņa has been recounted contextually. So in this perspective, this kāvya may be regarded as a ‘Miniature Rāmāyaņa’ in Oriya literature. Just as Rāmāyaņa is named after King Rāma with depiction of his life-deeds, so in a greater sense Tapasvinī kāvya may be construed as a ‘Sītāyana’, as it prominently features the sublime character of Sītā in the entire story.(11)

SUBSTANCE OF TAPASVINĪ :

As per the epical tradition of India, Gańgādhara, in the beginning of Canto-I, pays humble homage to the Goddess of Speech in an inquisitive manner. Further he expresses his desire that indicates the main theme of the kāvya. He modestly prays :

‘To the hermitage of Sage Vālmīki
my mind has rushed to have a view
of the exiled Jānakī.
Her worn-out heart, alas !
how did she sew ?
Her life how with whom did she pass ?

O Compassionate Goddess ! Be kind
to bestow strength so that my mind
be sanctified by seeing
and my hand by writing.’


After the prayer, there appears the pathetic scene of the banished Sītā in the solitary site on the bank of Gańgā. The bewailing Sītā condemns her own fate for exile. Nature, in all aspects sympathetic to her, becomes stunned at her mourning.

In Canto-II, the hermitage of Vālmīki is found reigned by Queen Peace (Śānti). With the fatherly affection of Vālmīki and the motherly love of the hermit-matron Anukampā (a new creation of the poet), Sītā resides in the hermitage. In Canto-III, Rāma’s remourse after Sītā’s exile is depicted. Further kingship is assessed as a sacrifice where a king offers himself as an oblation for the public welfare. Rāma and Sītā, both forlorn in their respective places, become absorbed in pathetic thoughts of separation.

Canto-IV contains a lively and comely picture of Dawn (Ushā) in the hermitage. Sītā, accompanied by Anukampā and the hermit-girls, goes to River Tamasā who expresses all her motherly affections. After ablution, all enter the pleasure-garden where Sylvan Beauty (Vana-Lakshmī) is delineated as a maiden-friend of Sītā. Cordial welcome and parlance of both the friends are pleasantly portrayed.

Canto-V just follows the previous one. The juvenile spring is observed in the garden. Sītā enjoys all sorts of regards and welcome from trees, creepers, flowers, birds and other various aspects of Nature. Anukampā admonishes Sītā about the three kinds of Śraddhā that are divine, human and diabolic. She further figures Sītā as a Tapasvinī endowed with the divine qualities. At about 7 a.m. all return to their abodes and perform their daily duties.

In Canto-VI, a moonlit night of Chaitra month, rich with breeze and fragrance of flowers, comes to the view. Couple of glow-worms are praised by Sītā. Before a hermitess-friend, Sītā narrates all the stories starting from her childhood up to the forest-dwelling. Canto-VII covers the subsequent part of the story till the banishment, as narrated by Sītā before the maiden-friend. The lamenting Sītā is consoled and supported by the friend and other hermit-maidens.

Canto-VIII gives a picturesque view of Summer with the beauties of Nature. Worldly behaviour is alluded with the aestival affluence. Sītā’s reminiscences come to the scene. Dame Thought (Chintā) appears before her and apprises of the arrival of some guests. Coming one by one, Chitrakūţa, Mahānadī, Godāvarī and Ayodhyā, all alive, express feelings of their sorrow-stricken hearts before Sītā and retreat.

In Canto-IX, Rainy Season is described with natural colours and splendours. Nature shows her sympathy and concern for Sītā languishing under pregnancy. Birth of the twin sons, Kuśa and Lava, gladdens Nature. Canto-X speaks of the filial affection of Sītā, growth of the twins, their studying various scriptures, their melodious recitation of Rāmāyaņa in accompaniment of lutes and Sītā’s joys with sorrows

Canto-XI embodies Vālmīki’s pondering over the administration of King Rāma, fitness of the twins as the heirs of the royal dynasty and invitation from Rāma to attend the observance of Horse-sacrifice in Ayodhyā. Hearing the message from the Sage and deliberating about her own queenly status, Sitā suspects that Rāma might have accepted a second wife; because the presence of wife is a must for yajamāna in sacrificial performances. Then Sitā secretly and sorrowfully writes an humble letter to King Rāma. This letter is a unique and original issue of the muse of Gańgādhara. In this letter, Sitā earnestly prays Rāma to apprise her of the secrecy of incantation and penance rendered by the second queen (as suspected in Sītā’s mind), so that Sītā would practise more severe penance than hers to acquire Rāma as own life-lord in the next birth also.

After knowing from the twins the news that Rāma has kept the gold image of Sītā as the lady associate and not a second spouse, she shamefully becomes overwhelmed with beatitude. Keeping her letter secret, she inwardly apologizes to her husband-king. Sage Vālmīki and Sītā admonish the twins about their future performances in the sacrificial site. Dame Sleep (Nidrā) and Yogamāyā come to the cottage of Sītā to take her on their laps. Sītā views the royal coronation of King Rāma with herself as Queen, along with Lakshmaņa, Bharata, Śatrughna, Kuśa and Lava. On this auspicious occasion, deities and demi-gods shower flowers from the firmament. Thus Tapasvinī ends with the following lines :

‘In every house, in every life, in every city,
in the river-boat, in the bark of the sea,
in every cavern,
at day and night,
in the even and the morn,
in dolour and delight,
in the hearts of the affluent
as well as of the indigent,
reigns ever-reverberant
the ‘Victory-to-Sītā-Rāma’ chant.
Observing all these,
stood entranced at the scene
the Crest-Crown of the chaste ladies,
the Great Queen.’


POETIC STYLE :

Tapasvinī, as the masterpiece of Gańgādhara Meher, enjoys an outstanding position in the arena of language and literature. The desideratum of the poet in composing this kāvya was mainly to fill in the gap of a character of devoted chaste wife flourished with Indian culture, in the domain of Oriya literature and to establish the language of Orissa with its epical excellence. Befitting the modern taste, the poet has utilized different nine melodious metres (Chaturdaśākshara, Rāmakerī, Bańgalāśrī, Chokhi, Rasakulyā, Kalahamsa-Kedāra, Kedāra-Kāmodī, Naţa-Vāņī and Kalyāņa-Pađitāla), collaborating the old metres with the modern ones.

Musical melody, grace of diction, serenity, rhythmic eloquence, lucidity with emotional touch and sweetness of meaning are the remarkable features of this epic poem. Various figures of speech such as alliteration, simile, metaphor, imagery and the like also find proper and praiseworthy places in this literary work. There occurs no verbosity or stiffness of speech. Predominance of meaning and sentiments is greatly appreciable. Words of Gańgādhara are pleasantly intelligible and imbued with emotions. So this kāvya has become unhesitatingly attractive and appealing.

In the beginning of his poetic life, Gańgādhara was influenced by the poets of Rīti-Yuga of Oriya literature for writing in ornate style; but later on, observing the literary milieu, he adopted the contemporary new style. Therefore a blended pattern is found in his compositions. Dr. Māyādhar Mānsinha, an eminent Oriya poet and critic, has aptly regarded Gańgādhara Meher as the ‘Classical Star’ and ‘Miniature Kālidāsa’ of Oriya literature.(12) Dr. Binod Chandra Nāik, a reputed modern poet and critic of Oriya, describes Gańgādhara as a ‘Supreme Craftsman’ creating Tapasvinī kāvya with rhetoric patterns, like weaving Sambalpuri sāree with ornate designs at the loom.(13)

SENTIMENT OF PATHOS :

Pathos is the prevailing sentiment in Tapasvinī. In Canto-X, as regards the episode of Rāmāyaņa, especially the post-exile incident of Sītā, Gańgādhara metaphorically mentions :

‘Plenteous is the Epic-mountain
with gems of sentiments.
There majestically roams Rāma-Lion.
Forming murmuring fountain
blood-stream of Rāvaņa-Elephant flows further.
Residing in a cavern, there laments
the Lioness suffering affliction
by tusk-tossing of the tusker.’


In Oriya literature, ancient poets have tried to avoid the particular description of Sītā’s post-banishment story in detail, as it is a matter of poignant Pathos. Gańgādhara took up this topic and composed Tapasvinī in so heart-touching manner that it appealed to the minds of the readers and became considered as the best among his kāvyas.

In Classical Sanskrit Literature, Bhavabhūti is the first poet and dramatist who advocated and elucidated the Sentiment of Pathos (Karuņa Rasa) in a separate style and presented it as the original source of all sentiments.(14) Verily in Indian tradition, it may be observed that Rāmāyaņa known as Ādi-kāvya was originated by Sage Vālmīki who felt the Pathos in his heart by seeing the death of a Krauñcha bird killed by a hunter and the spontaneous flow of a metrical verse was emitted from the mouth of the Sage that led to the composition of the great epic Rāmāyaņa.(15) Kālidāsa conspicuously declares that Vālmīki’s ‘Śoka’ (sorrow) raised by seeing the death of Krauñcha bird turned into ‘Śloka’, the metrical verse.(16) In view of literary criticism also, famous rhetorician Ānandavardhana also clearly mentions the same thing in his work, while dealing with ‘Rasa’ as the essence or Ātmā of poetic composition.(17) Poet Śrīharsha also speaks of Vālmīki’s ‘Śoka’ and ‘Śloka’ describing the praise of God’s incarnation as Rāma.(18)

In this connection, a line from the great poet P.B. Shelley’s poem (19) may be recalled : “Our sweetest songs are those that tell of saddest thought.” Flash of bliss intrinsically abides even in the sentiment of Pathos; otherwise nobody would be inclined to the sentiment which above all permeates the Rāmāyaņa. Viśvanātha Kavirāj, a reputed rhetorician and poet of Sanskrit, succinctly declares blissfulness of all the sentiments.(20) Poet Gańgādhara is influenced by Bhavabhūti. In Tapasvinī, the excellence of Pathos begins from the outset. Though other emotions are accessories in the middle, sentiment of Pathos is prominent. The poet has avoided to end the kāvya in a tragic description and made the ending comically happy, depicting Sītā’s union with King Rāma even in a dream state. Apropos filial affections of Sītā for her twin sons (Canto-X), also that of Anukampā and River Tamasā (Canto-IV) and as well as of Godāvarī (Canto-VIII), Vātsalya Rasa is contextually blended in this kāvya.

Kālidāsa’s words are mostly indicative or suggestive of sentiments, while like Bhavabhūti’s, appropriate words of Gańgādhara are mostly expressive and directly appealing to the hearts of the readers. In comparison to other sentiments, Pathos directly touches the core of heart and Gańgādhara has successfully portrayed the sentiment that leaves an ever-lasting impression in the mind. While reading different cantos of Tapasvinī, one can really experience the intensity of sentiment and the eyes emotionally get suffused with tears. Such is the speciality of Gańgādhara’s poetic pen which is capable of melting the hearts of the readers in pathetic descriptions.


CONJUGAL LOVE OF RĀMA AND SĪTĀ :

In Tapasvinī, as in other literary works of Gańgādhara, conjugal love is a divine and sacred phenomenon. His words in the matter of Eros are romantically gentle, polished, descent and lovely. In the sylvan avenues, Sītā’s appearance as a beautiful Flowery Queen before Rāma is a fine illustration of such love. The muse of Gańgādhara allows not a jot of so-called obscenity in the love of the royal couple. They reciprocally pine in their separation and experience pains mixed with pleasures.

King Rāma’s love for Sītā is sincerely selfless and dedicated. He discards her simply because of the false public calumny. Forlorn and perpetually perplexed, he depreciates the royal throne. To render the regal duty, i.e. public gratification, he sacrifices his personal happiness of life; still his mind’s drone remains rapt in relishing the sweet mead of the Lotus-Queen blown in the lake of heart. In Canto-III, as the context goes on, Rāma addressing his sense-organs admonishes:

‘One thing more I like to tell,
Be united with mind and hastened to dwell
in the lake of heart where bliss sublime
you all will sportively enjoy for endless time.

There abides my life-mate
new Lotus-maiden in full efflorescence.
Ever-scintillating and never-set
remains the Sun of reminiscence.’


Sītā, as a devoted wife, understands the inner feelings of her husband who is an ideal king and ruler of the country. She reminds the words of the King within her wailings and says in Canto-I :

‘For public pleasure’s sake
need arises if,
prepared I’m to forsake
even Sītā, my life-like wife.’

Thus you had declared
before Sage Ashţāvakra, O My Lord !
You must be recalling in memory
never slackening those words promissory.’


Here the idealistic supremacy of King Rāma is observed following the idealism maintained by Bhavabhūti. In his drama Rāma proclaims : “For propitiation of the subjects, I have no pain in sacrificing my personal affection, compassion and happiness, even my wife Jānakī also.”(21) In the pen of Gańgādhara, establishing own duties and status, Sītā further says :

‘To the words of thy father
in disobedience you stand never.
In obeying the words of husband,
if in my heart arises no grief,
then only I’ll be worthy
of the status of your wife.
This matter certainly
my mind shall understand.

Of the public contentment
Thyself, an avower ardent.
Further I’m thy wife
as per the laws of wedding life.
Every step of mine does lead
in thy foot-prints indeed.’


Sītā as a Tapasvinī incarnates all the divine qualities that place her in the highest honourable shrine among the devoted wives of Indian culture. The word ‘Satī’ (Chaste woman) is oft-used in Tapasvinī to evince her pure and unblemished character. Bhavabhūti depicts Sītā as an idol of Pathos or an embodiment of pangs of separation.(22) In the pen of Gańgādhara, Sītā is delineated as an embodiment of Pathos.

Natural love of River towards Sea is distinctly illustrated as compared to Sītā’s love for Rāma in Canto-II. Here originality of Gańgādhara is really appealing. The public censure separates the couple from each other; yet the beloved lady of vast heart patiently endures the estrangement. As the context goes on, Vālmīki consoles Sītā in the following lines :

‘Spontaneous is the flow of River
to mingle with Sea, her own lover.
She firmly crosses pass and rock
that appear on the way to block.

With Sea when she enjoys union,
her all previous pains plunge into oblivion.
Between the lives of the two thence
really remains not a jot of difference.

Perchance piercing up amid
any huge mound of sands there
if raises high
and severs the hearts of the loving pair,
verily River cannot die.
Burthen of her life she bears indeed
by expanding own heart to take
the shape of a large lake.’


Contextually in Canto-IX, Sītā becomes very happy after seeing the birth of the twin sons; but owing to separation from her husband-king who is unable to partake of the happiness, she feels dejected. Here the poet speaks:

‘Blissfully bright the hermitage shone;
but darkness pervaded the Lily
of Sītā’s face, bereft of Rāma-Moon alone.
Her festival was verily
amāvāsyā, the moonless night.
Darkness enhanced her greatness.
Lovable is the Moonlight
solely because of darkness.’


Residing in the hermitage of Vālmīki, Sītā feels comforted among the companions. Regarding Sītā’s Love for King Rāma in Canto-V, the poet expresses :

‘Happiness emerging from affection
of hermits and hermitesses
ousted Sītā’s all the mental distresses.
Into the path of her recollection
there didn’t enter
the royal pleasure
even once by mistake.
In her lucid heart’s lake
was always sportively swimming
Rāma-Swan, supremely charming.’


Concerning Sītā’s devotion-to-husband (pati-bhakti), Gańgādhara differs from other poets by remodelling the epical episode. He presents three reasons of her exile-like misfortune.(23) As Sītā thinks, firstly she had mean-mindedly reprimanded the innocent Lakshmaņa and had sent him in quest of her husband, just after hearing the voice “Save me, O Lakshmaņa” from the interior of Pañchavaţī forest. Secondly, while she was captive in Aśoka grove, Rāvaņa showed a severed illusory head before her eyes and she desperately bemoaned thinking the very head to be her husband’s, further seeing the head she did not die at the spot. Thirdly, deeming the happiness of service at her husband’s feet to be very slight, she became prone to have the pleasure of visiting the hermitage near Gańgā. All these three sins, as Sītā explains by introspection, account for the exile fit for her.

In the verses of Kālidāsa, Sita knowing the exile from Lakshmaņa sorrowfully delivers her words for her husband thus: “Knowing me pure through the fire-ordeal in front of all, you abandoned me after hearing rumours from some people. Is this deed befitting your celebrated pedigree ?”(24) Next moment, she ponders that the exile is the unbearable consequence of her sins acquired in the previous births.(25) In the poem of Gańgādhara, Sītā does never tell a word of rebuke to her husband and merely expresses the above-mentioned three reasons of her self-analyzed sins. This issue exhibits an originality of the poet.

While Sītā was refused by King Rāma and was asked to testify her chastity in the fire-ordeal at Lańkā, as seen in the Vālmīki-Rāmāyaņa,(26) she expresses her feelings with tearful eyes by saying that King’s behaviour towards her is like that of a low-category man to his low-category wife and further prays to the Fire-god to save her life giving proof of her purity. In Tapasvinī, Sītā does not have any propensity to bear the life of a suspected wife and intrepidly invokes her Dharma (Righteousness or Devotion-to-husband) to enter with herself into the enkindled fire to prove her chastity. In Canto-VII, she prays:

‘O Dharma ! In my body
with your excellence entire,
have a stance steady.
Intimid with me enter into the fire.
Not possible if
in my present life,
then after my demise
for my lord’s sake
at his feet you’ll make
myself a maid-servant please.

After my body perishes,
it will turn into ashes.
For a tree, taking them
you’ll make use as manure.
Giving the wood of the same
in the hands of a carpenter,
you’ll get my being prepared
as a pair of sandals fit
for the sacred feet
of my loving life-lord.’


Such is the self-confident devotion-to-husband that reaches the pinnacle of conjugal love. This description also reveals an innovation of the poet. In true sense, Sītā has been depicted as a wife completely consigned to her husband and such love, rid of all selfishness, is a rarest phenomenon for a wife in the household affair of Indian society.

DEPICTION OF NATURE :

Nature offers a favourable and fruitful profile, particularly for poets and litterateurs. Having an inseparable relationship with mankind, she forms a familiar friend and guide for all. Poets are lovers and literary painters of Nature, also the knowers and way-makers of a healthy ambience in socio-ecological perspective.

Like Kālidāsa in Sanskrit and William Wordsworth in English, Gańgādhara Meher is well known as ‘Poet of Nature’ (Prakŗti-Kavi) in Oriya literature. In his poem, Nature is always alive and personified. All the aspects of Nature express their joys, sorrows and other feelings corresponding to the feelings of human beings. Gańgādhara vividly and exhaustively delineates the beautiful facets of Nature. With his poetic insight, he sees human feelings, conscious life and internal beauty in her. Nature imbibes her comely, gracious, fierce, tranquil and auspicious forms in various contexts.

Depiction of Dame Ushā (Dawn) in Canto-IV is most popular all over Orissa. Here Nature honours Sītā as an esteemed Queen and offers all the royal formalities of worship. Dawn, the blooming lotus-eyed lady, cherishing hearty desire to behold Sītā and bringing gift of dew-pearls in her hands of leafage, stands in the outer courtyard of the hermitage and in cuckoo’s voice speaks to grace her with Sītā’s benign sight. The retinues of Dawn perform their duties to wake up Sītā. For example, in the description of the poet :

‘Musical tune Zephyr sang swinging.
Black Bee played on lute charming.
By Ushā’s bidding, in dance
rapt remained Fragrance.
Kumbhāţuā bird as a royal bard
began to eulogize forward.
As the panegyrist premier
Kalińga bird appeared there,
And spake in voice gracefully sweet :
‘Wake please,
O Queen of the empire of chaste ladies !
Dawned the night.’


Dawn (Ushā) with her Sun-brown costume, blooming smile of flowers and calm countenance, appears as a Goddess of Yoga giving solace by sweet words and rendering relief from sufferings. She as if descends from heaven on earth to give a new life. Sītā pays her devotional reverence to the auspicious Dawn.

In Canto-III, Gańgādhara describes a marvellous scenery of Sunshine and Dusk with poetic imagination. The picture of Nature appears thus :

‘On the bank of Bhāgīrathī, whlle
Lakshmaņa deserted Sītā to exile.
sunshine had spread that moment
all over the regions
of the world along with oceans
neath the fair firmament.

As though it was a white screen
draped over by Sun
after deliberation
that shame it would be, if the affliction
of Rāma’s Queen was seen
to the deities’ dominion.

Knowing that secret discreetly,
to disclose the flaw of Sun’s race,
Dusk lifted swiftly
the screen from earth’s surface.’


As the context continues in Canto-IV, Sītā accompanied by Anukampā and the hermit-girls, goes to River Tamasā for early ablution. Tamasā, the fair-limbed and sacred-streamed hostess of the hermitage, with her wave-hands places Sītā on her lap and embraces with affections. Sītā regards Tamasā as her mother and the latter shows filial affections for the exiled daughter.

In this Canto, Vana-Lakshmī (Sylvan Beauty) extends her heartiest welcome to the exiled Sītā and her friendly address is emotionally expressed. For instance:

‘By Pushpaka plane, when
you were returning through the sphere,
I standing here
bearing in hands the gift of flowers fine,
with gazelle’s eyes woefully gazing above
was calling you with keen love
in the voice of peahen
from a long way.
Friend dearest mine !
Did you come today
remembering this companion
after so many days gone ?’


In Canto-I, seeing the banishment of Sītā, Nature mourns with severe distress and with her army tries to take vengeance upon Fate. A fierce form of Nature is remarkable in the poem as follows:

‘To fight against Fate, there roared
Palm Tree with furious figure
raising his hand with sword.
Shaking frequently the quiver
of Weaver-bird’s nest, he as if
drew an arrow of leaf.’


Knowing own banishment rendered by her husband, when Sītā falls senseless in the ground, depicting the reaction of the sympathetic Cloud, the poet says:

‘Bearing the heart frustrated
and the body emaciated,
there arrived, rushing with armies
the seriously angry Cloud.
Startling others’ eyes
by the rumbling, deep and loud,
he defied Destiny and betrayed menace.
Again and again sprinkling on Sītā’s face
soothing drops of water
he vivified her.’


Description of Spring in Canto-V and of Summer in Canto-VIII manifests the glaring facets of Nature. The panoramic scenery of Chitrakūţa, Godāvarī, Mahānadī and Ayodhyā in Sītā’s mind’s eye appears very much attractive. Nature of Rains in Canto-X helps at the time of Sītā’s delivery. In the merrymaking and ceremony of the birth of Kuśa-Lava, and in reciting the Rāmāyaņa epic emulating the songs sung by the twins, Nature presents her gracious and joyous forms.

Gańgādhara, on one side, has adopted various phases of Nature to depict the human beauty and on the other, he has inserted human aspects with a view to presenting the lively loveliness of Nature. Both internal and external beauties of Nature are well-depicted in Tapasvinī. Veritable is his epithet ‘Prakŗti-Kavi’, the Poet of Nature.

PHILOSOPHY OF LIFE :

The ideology of Bhavabhūti along with the naturality of Vālmīki and Kālidāsa are intertwined in the poem of Gańgādhara. The quintessence of poet’s philosophy of life has been contextually reflected in Tapasvinī. Forbearance, theistic trend, noble endeavour for the attainment of goal and high aspiration are signified in his work. He believes in both deed and destiny, but never adheres to pessimism. For instance, life of fortitude, benevolence and polite activities is indicated in Canto-IV. River Tamasā expresses before Sitā regarding the significance of life:

‘Wandering over several woods wide,
never wavering astray
by illusion of any gorge,
surmounting many an impediment
in my life limpid,
never deeming darkness
as a distress,
never thinking light
to be a delight,
for a remote way
ahead I’ve continued to forge
with my head humbly bent.
Gratifying every bank-dweller
with offering of water,
fruitfulness of my birth
I’m realizing worth.’


Gańgādhara’s humanistic approach of reaching the destination through incessant practice is traced here. Simplicity, modesty, purity, harmlessness and noble services are the gem-like features of his work and life. Whatever may be the obstacle, the poet’s optimistic insight pervades the realm of life. “Simple living and high thinking” is his view-point both literary and empirical.

In spite of negative attitude of some fault-finders in social life, one should patiently and courageously go ahead to establish one’s own goodness and virtues valuable to others. In Canto-IX, Ketakī’s words for Sītā are worth-mentioning:

‘Conjured by the cynics’ eyes
what can the blemish do,
when one’s own noble qualities
form a divine ornament true ?
Seeing my thorns
with repugnance,
if black-bee from me returns,
shall I forgo the pride of fragrance ?’


In Canto-IV, regarding motherly affection of River Tamasā, Sītā as a wretched daughter expresses her hearty feelings. The poet says:

‘Sītā replied :
Like the water of coconut
sweet is this limpid water;
nay, nay, not water, but
mother’s milk real,
flowing as the stream ambrosial
for Sītā, the dead-like daughter.
Oh ! In this land you’re indeed
my mother dearest
incarnate as Tamasā having a heart
riven by my severe smart.’


In the same context, the poet exhibits the inner feelings of a mother in the words of Sita to River Tamasā :

‘Mother verily knows
her daughter’s sorrows.
A burnt-faced daughter
looks moon-faced in the eyes of mother.’


Deprived of Sītā’s company in Ayodhyā, Dame Royal Beauty (Rāja-Lakshmī) becomes distressed and sends a letter to Sītā through Ayodhyā who reads the same contextually.
From the letter in Canto-VIII, some lines run thus:

‘Friend ! Myself Night,
You were Moonlight.
Closing my eyes
of blooming lilies
afar you went.
No more thence
remains for me in your absence
even a vestige of pleasure.
I’ve borne the figure
of a woman rid of ornament.’


In Canto-II, hearing Sītā’s mourn, the hermit-girls reach the spot and after consoling her, intimate the father-like Sage Vālmīki about the matter. Here Gańgādhara, to draw the compassion of the same female category, employs the hermit-girls only, not the hermit-boys, nor Vālmīki himself. Contextually hermit-boys are engaged in this matter, as described in the Rāmāyaņa (27). Sage Vālmīki himself moving in the forest for collection of wood and kuśa grass hears Sītā’s wailing and approaches her, as depicted in Raghuvamśa (28). In Tapasvinī, the heartiest relationship between Sītā and the hermit-girls who were companions in her previous forest-dwelling with her husband is beautifully described in Canto-VII in the mouth of Sītā herself before a hermitess-friend in the later forest-dwelling. For example:

‘Their holy affections,
endearment mingling with exhilarations,
lips lovely with soft sweet utterances
and loving calm guileless glances,
all showered ambrosia immense
on the glebe of my reminiscence.

All the names of those dear
hermit-girls, one by one,
blooming as lotuses appeared clear
in my mind’s lake gay,
when the nocturnal murk of separation,
previously poignant and piled,
vanished far away
and the day-spring of happiness smiled.’


From the above-mentioned illustrations, it may be asserted that in presenting the struggle of life, social norms and behaviours, ethical values of human relationship, sympathetic feelings and other mundane phenomena, Gańgādhara identifies his deep-delved dexterity with his intrinsic poetic vision. Several maxims are also befittingly blended. Further dramatic style and retrospective presentations can be marked very exquisitely in this epic poem.

Analysing the literary works and life of Gańgādhara, Dr. Māyādhar Mansinha regards him as a ‘Literary Hero’ referring to the various kinds of heroes of human society described by Carlyle.(29) Really Gańgādhara, being a poet, a social reformer and a patron of Indian culture, is very frank, fearless and ever-beneficial for the country and the mankind at large. As a brave and modest poet, he has tried his best to characterize nobility and brighter sides of life even in the midst of struggle and sufferings.



CONCLUSION :

Tapasvinī elaborates a pathetic plot of the great epic Rāmāyaņa. However Gańgādhara contextually cites some sites of his own province suitable to the situations. Describing the sorrows of Sītā as well as of the hermit-girls (Canto-III), he exemplifies the river Mahānadī along with its tributaries Ańga, Iba and Tela. He refers to the gorge Rāmeśvara of Mahānadī (Canto-III) near Sambalpur, also to Hirākud (Canto-VIII). All these places are mostly attached to Sambalpur district. Expressing the love of River and Sea, he adverts to Lake Chilikā located in the eastern coast of Orissa. This instance is conspicuous from the footnote given by himself (Canto-III). All these regional geographical environs assert loving attraction of the poet for his birth-place and do not mar the beauty of literary theme in any manner.

In an epoch-making period of modern age of Oriya literature, Gańgādhara’s contributions for establishing the language, literature and culture of Orissa are worthy of appreciations. For own extraordinary literary calibre and honest guileless personality, he has earned high admirations and endearments from his contemporary noted litterateurs like Kavivar Rādhānāth Rāy, Vyāsakavi Fakir Mohan Senāpati, Pallikavi Nanda Kiśor Bal, Viśwanāth Kar, Kaviśekhar Chintāmaņi Mahānty, Paņđit Nīlamaņi Vidyāratna, Utkal Gaurav Madhusūdan Dās and many others.

From social point of view, Sītā is regarded as a daughter of King Janaka, yet she was born from the furrow of earth, and therefore an offspring of Nature. A subtle true observer and a proficient literary commentator of Nature, Gańgādhara Meher is the first and most successful poet in Oriya literature to give a complete epic form to the post-exile episode of Sita with a beautifully impressive touch of Pathos. He is a worshipper of Truth, Good and Beauty. His is an all-encompassing artistic view with idealistic faith and sincerity.

For Tapasvinī that deserves a classical dignity and enviable reputation among the epic poems, Gańgadhara is heartily remembered by the lovers of literature. In this kāvya, literary propriety with values of life is commendable indeed. Lapses in Gańgādhara’s writing are hardly seen. In the present day also, Tapasvinī, a prominent poetic achievement on the ever-green Sītā-Rāma-story, may be useful in the field of comparative study among various literatures of Indian languages.

* * *

REFERENCES :


1. Meher, H.K., Kavi Gańgādharanka Tapasvinī Kāvya : Hindī-Ińgrājī-Sanskruta
Anuvādara Triveņī, ‘Bartikā’, Vishuva Special, 1999, pp.178-209.
Saraswat Sahitya Sanskrutika Parishad, Dasarathpur, Jajpur, Orissa.

2. Meher, H.K., Canto-IV from the English Rendering of Tapasvinī Kāvya,
Kāntāraka’, 2000, pp.14-20, Bhawanipatna, Kalahandi.

3. Meher, H.K., Kavi Gańgādharanka Tapasvinī-Kāvyara Hindī O Ingrājī Anuvāda,
‘Saptarshi', May-June 1992, pp.1-25,
Sambalpur University, Jyoti Vihar, Burla, Sambalpur.

4. Meher, H.K., Kavi Gańgādharanka Tapasvinī Kāvyara Hindī O Ińgrājī Anuvāda;
Eka Nūtana Diganta, ‘Jhańkār’, August 1996, pp. 564-576,
Prajatantra Prachar Samiti, Cuttack.

5. Meher, H.K., Excerpts from Gangadhar Meher’s Tapasvini,
Suntimes’, Sunday Special, Bhubaneswar, 28-8-1988, p.8.

6. Sāham tapah sūrya-nivishţa-dŗshţir
ūrdhvam prasūteś charitum yatishye /
Bhūyo yathā me jananāntare’pi
Tvam eva bharttā na cha viprayogah //
(Raghu.14/66)
Chaturvedi, Sitaram (Ed.) Kālidāsa Granthāvalī – Raghuvamśa, Samvat 2019,
Bharat Prakashan Mandir, Aligarh.

7. Nŗpasya varņāśrama-pālanam yat
sa eva dharmo manunā praņītah /
Nirvāsitāpyevam atas tvayāham

Tapasvi-sāmānyam avekshaņīyā // (Ibid. 14/67)
Chaturvedi, Sitaram op.cit. Samvat 2019.

8. Vanyena sā valkalinī śarīram
patyuh prajā-santataye babhāra //
(Ibid. 14/82)

9. Meher, H.K., Preface of Tapasvinī – English Rendering.

10. Ibid.

11. Meher, H.K.,Tapasvinī (Hindi Rendering Book), 2000, p.15.
Sambalpur University, Jyoti Vihar, Burla, Sambalpur.

12. Mansinha, M.D., History of Oriya Literature, 1962, pp.199-200.
Sahitya Akademi, New Delhi.

13. Naik, B.C., Gangadhar Meher (Makers of Indian Literature Series),
1996, p.35.
Sahitya Akademi, New Delhi.

14. Eko rasah karuņa eva nimitta-bhedād
bhinnah pŗthak pŗthag ivāśrayate vivarttān /
Āvartta-budbuda-tarańgamayān viśeshān
ambho yathā salilam eva hi tat samastam //
(Uttara-Rāma-Charita, 3/47)
Regmi, S.S.,(Ed.), Uttara-Rāma-Charita of Bhavabhūti, 1971,
Chowkhamba Sanskrit Series Office, Varanasi.

15. Mā nishāda pratshţhām tvam agamah śāśvatīh samāh /
Yat krauñcha-mithunād ekam avadhīh kāma-mohitam //
(V. Rāmāyaņa, 1/2/15)
Vālmīki, Śrimad Vālmīkīya Rāmāyaņa, Samvat 2049,
Gita Press, Gorakhpur, U.P.

16. Nishāda-viddhāņđaja-darśanotthah
ślokatvam āpadyata yasya śokah //
(Raghu.14/70)
Chaturvedi, Sitaram, op.cit. Samvat 2019.

17. Kāvyasyātmā sa evārthas tathā chādi-kaveh purā /
Krauñcha-dvandva-viyogotthah śokah ślokatvam āgatah //
(Dhvanyāloka, 1/5)
Tripathy, R.S., (Ed.) Dhvanyāloka, 1995, p.142, Motilal Banarsidass, Delhi.

18. Krauñcha-duhkham api vīkshya śuchā yah
ślokam ekam asŗjat kavir ādyah /
Sa tvaduttha-karuņah khalu kāvyam
śloka-sindhum uchitam prababandha //
(Naishadha. 21/76)
Śrīharsha, Naishadhīya-Charitam, 1952, Nirnaya Sagar Press, Bombay.

19. Palgrave, F.T., ‘To A Skylark’ (poem), The Golden Treasury, 1979, p.245.
Oxford University Press, Calcutta.

20. Sastri, S.,(Ed) Sāhitya-Darpaņa (Chapter 3/ 4-5), 2000, p.52,
Motilal Banarsidass, Delhi.

21. Sneham dayām cha saukhyam cha yadi va Jānakīm api /
Ārādhanāya lokasya muñchato nāsti me vyathā //
(Uttara-Rāma-Charita. 1/12)
Regmi, S.S., op.cit. 1971.

22. Karuņasya mūrtir athavā śarīriņī
viraha-vyatheva vanam eti Jānakī //
(Ibid. 3/4)

23. Das Hemanta Kumar (Ed.), Gańgādhara Granthāvalī (Tapasvinī, Canto-1), 1977,
Pustak Bhandar, Berhampur, Orissa.

24. Vāchyas tvayā mad-vachanāt sa rājā
vahnau viśuddhām api yat samaksham /
Mām lokavāda-śravaņād ahāsīh
śrutasya kim tat sadŗśam kulasya //
(Raghu. 14/61)
Chaturvedi, Sitaram, op. cit. Samvat 2019.

25. Mamaiva janmāntara-pātakānām
vipāka-visphūrjathur aprasahyah //
(Ibid.14/62)

26. Kim mām asadŗśam vākyam īdŗśam śrotra-dāruņam /
Rūksham śrāvayase Vīra prākŗtah prākŗtām iva //

(Vālmīki Rāmāyaņa. 6/116/5)

27. Sitām tu rudatīm dŗshţvā te tatra muni-dārakāh /
Prādravan yatra bhagavān āste Vālmīkir ugradhīh
// (Ibid. 7/49/1)
Vālmīki Rāmāyaņa, Samvat 2049.

28. Tām abhyagacchat ruditānusārī
Kavih kuśedhmāharaņāya yātah
// (Raghu.14/70)
Chaturvedi, Sitaram, op. cit. Samvat 2019.

29. ‘Meherańka Mahattva’(Article) - Gańgādhara Granthāvalī, 1961, p.5,
Das Brothers, Berhampur-Cuttack-Sambalpur, Orissa.

(Main Source :
‘Tapasvini of Gangadhara Meher : A Critical Observation’
Research Article By Dr. Harekrishna Meher
Published in ‘Kalahandi Renaissance’ , Volume-1, 2005,
Bhawanipatna, Orissa.)

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